Monday, 29 December 2014

सिर्फ अच्छाईयों पर अपना ध्यान केंद्रित रखें

बहुत समय पहले की बात है. एक बार एक गुरु जी गंगा किनारे स्थित किसी गाँव में अपने शिष्यों के साथ स्नान कर रहे थे .

तभी एक राहगीर आया और उनसे पूछा , ” महाराज, इस गाँव में कैसे लोग रहते हैं, दरअसल मैं अपने मौजूदा निवास स्थान से कहीं और जाना चाहता हूँ ?” गुरु जी बोले, ” जहाँ तुम अभी रहते हो वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं ?”
” मत पूछिए महाराज , वहां तो एक से एक कपटी, दुष्ट और बुरे लोग बसे हुए हैं.”, राहगीर बोला.
गुरु जी बोले, ” इस गाँव में भी बिलकुल उसी तरह के लोग रहते हैं…कपटी, दुष्ट, बुरे…” और इतना सुनकर राहगीर आगे बढ़ गया.
कुछ समय बाद एक दूसरा राहगीर वहां से गुजरा. उसने भी गुरु जी से वही प्रश्न पूछा , ”
मुझे किसी नयी जगह जाना है, क्या आप बता सकते हैं कि इस गाँव में कैसे लोग रहते हैं ?”

” जहाँ तुम अभी निवास करते हो वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?”, गुरु जी ने इस राहगीर से भी वही प्रश्न पूछा.
” जी वहां तो बड़े सभ्य , सुलझे और अच्छे लोग रहते हैं.”, राहगीर बोला.
” तुम्हे बिलकुल उसी प्रकार के लोग यहाँ भी मिलेंगे…सभ्य, सुलझे और अच्छे ….”, गुरु जी ने अपनी बात पूर्ण की और दैनिक कार्यों में लग गए. पर उनके शिष्य ये सब देख रहे थे और राहगीर के जाते ही उन्होंने पूछा , ” क्षमा कीजियेगा गुरु जी पर आपने दोनों राहगीरों को एक ही स्थान के बारे में अलग-अलग बातें क्यों बतायी.
गुरु जी गंभीरता से बोले, ” शिष्यों आमतौर पर हम चीजों को वैसे नहीं दखते जैसी वे हैं, बल्कि उन्हें हम ऐसे देखते हैं जैसे कि हम खुद हैं. हर जगह हर प्रकार के लोग होते हैं यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को देखना चाहते हैं.”
शिष्य उनके बात समझ चुके थे और आगे से उन्होंने जीवन में सिर्फ अच्छाइयों पर ही ध्यान केन्द्रित करने का निश्चय किया.

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देश तभी बदलेगा जब हम बदलेंगे


अंग्रेजी वर्ष 2014  समाप्ति की ओर अग्रसर है।  महज कुछ दिनों  में हम नए साल में प्रवेश  कर जाएंगे। इस गुजरते साल की बहुत सी खट्टी मीठी  यादें हमारे साथ रहेंगी पर अच्छा  होगा यदि हम  वर्तमान साल के अपने कटु अनुभवों, नैराश्य  एवं दुःख के क्षणों को त्याग कर, नव वर्ष  में नई ऊर्जा एवं नए संकल्प  के साथ प्रवेश करें। इस  वर्ष  हमारे देश में   बहुत कुछ  ऐसा  हुआ जो दुखद  दुर्भाग्यपूर्ण है।  यदि हमारे देश  के सुदूर उत्तरीय राज्य जम्मू  काश्मीर में इस  दशक की  भीषणतम  बाढ़ ने तबाही मचाई,   तो दूसरी तरफ देश के पूर्वी राज्य आसाम  में बोडो  आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार में 80 से   अधिक लोगों को  अपने जाने  गँवानी पड़ी। 

हाँ इस वर्ष हमारे देश के राजनितिक परिदृश्य ने एक बड़ा सकारात्मक बदलाव देखा।  भ्रष्ट  राजनिति  तंत्र से  नाउम्मीद हो चुके हमारे देश के युवाओं ने  नए एवं एवं सशक्त सरकार का निर्वाचन कर यह इंगित कर दिया है कि उनकी शक्ति को कोई अनदेखा  नहीं कर सकता।  उम्मीद  की जानी चाहिए कि हमारे देश की नव निर्वाचित सरकार आने  वाले सालों देश के करोड़ों लोगो की आकांक्षाओं  पर खड़ा उतरेगी। 

पर देश को  विकास  के राह पर लाना, अपराध, भय  एवं आतंकवाद  मुक्त करना सिर्फ सरकार की जिम्मेवारी नहीं  होनी चाहिए।  देश तभी बदलेगा जब हम सब  बदलेंगे। देश एवं समाज को भय, अपराध  मुक्त करने  के लिए हमें अपने  स्वयं के आचरण, चरित्र में सकारात्मक बदलाव लाना होगा, अपने अंदर के बुराइयों को मिटाना होगा और अपने अंदर छुपे `रावण' को नष्ट करना होगा।     

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Saturday, 27 December 2014

श्रेष्ठता का अहंकार

रामकृष्ण परमहंस को अध्यात्म पर चर्चा करना बहुत अच्छा लगता था। अक्सर वे विभिन्न संप्रदायों के संतों से मिलते और गंभीर चर्चा शुरू कर देते थे। एक बार वे नागा गुरु तोतापुरी के साथ बैठे थे। माघ का महीना था और धूनी जल रही थी। ज्ञान की बातें हो रही थीं। तभी एक माली वहां से गुजरा और उसने धूनी से अपनी चिलम में भरने के लिए कुछ कोयले ले लिए। तोतापुरी जी को माली का इस तरह आना और बिना पूछे पवित्र धूनी छूना बहुत बुरा लगा। उन्होंने न केवल माली को भला-बुरा कहा, बल्कि दो-तीन चांटे भी मार दिए। माली बेचारा हक्का-बक्का रह गया।

परमहंस की धूनी से वह हमेशा ही कोयले लेकर चिलम भरा करता था। इस घटना पर रामकृष्ण परमहंस जोर-जोर से हंसने लगे। तब नागा गुरु ने उनसे सवाल किया, 'इस अस्पृश्य माली ने पवित्र अग्नि को छूकर अपवित्र कर दिया। तुम्हें भी इसे दो हाथ लगाने चाहिए थे, पर तुम तो हंस रहे हो।'

परमहंस ने जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता था कि किसी के छूने भर से कोई वस्तु अपवित्र हो जाती है। अभी तक आप 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति' कह कर मुझे ज्ञान दे रहे थे कि समस्त विश्व एक ही परब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशमान है। लेकिन आपका यह ज्ञान तब कहां चला गया, जब आपने मात्र धूनी की अग्नि छूने के बाद माली को भला-बुरा कहा और पीट दिया। आप जैसे आत्मज्ञानी को देखकर सिर्फ हंसी ही आ सकती है। यह सुनकर नागा गुरु बहुत लज्जित हुए। उन्होंने माली से क्षमा मांगी और परमहंस के सामने प्रतिज्ञा की कि आगे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे।

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Friday, 26 December 2014

tsunami 10th anniversary today

Tsunami which wrecked havoc in the eastern coastal states of our country 10 years back on December 26, 2004, claiming thousands of lives and leaving several  thousands marooned, is still vivid in our memories.

Let's pray in silence for tsunami victims

Apart from India, it (tsunami)   had struck a dozen countries around the Indian Ocean rim, eradicated entire coastal communities, decimated families and crashed over tourist-filled beaches the morning after Christmas. Survivors waded through a horror show of corpse-filled waters.

In the past 10 years since this tragedy struck India, though life has come back to normalcy in the coastal regions of Tamil Nadu which suffered maximum out of this devastating tragedy, there are still thousands who are living in miserable conditions. Moreover, no help and support can be a substitute for the enormous loss of lives caused by this tragedy.

On 10th anniversary of tsunami today, we must pray in silence for the victims who lost their lives and must commit our unflinching support for the survivors.

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Monday, 22 December 2014

सब्र का फल मीठा होता है !

एक गरीब युवक, अपनी गरीबी से परेशान होकर, अपना जीवन समाप्त करने नदी पर गया, वहां एक साधू ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। साधू ने, युवक की परेशानी को सुन कर कहा, कि मेरे पास एक विद्द्या है, जिससे ऐसा जादुई घड़ा बन जायेगा जो भी इस घड़े से मांगोगे, ये जादुई घड़ा पूरी कर देगा, पर जिस दिन ये घड़ा फूट गया, उसी समय, जो कुछ भी इस घड़े ने दिया है, वह सब गायब हो जायेगा। अगर तुम मेरी 2 साल तक सेवा करो, तो ये घड़ा, मैं तुम्हे दे सकता हूँ और, अगर 5 साल तक तुम मेरी सेवा करो, तो मैं, ये घड़ा बनाने की विद्द्या तुम्हे सिखा दूंगा।

बोलो तुम क्या चाहते हो? युवक ने कहा, महाराज मैं तो 2 साल ही आप की सेवा करना चाहूँगा, मुझे तो जल्द से जल्द, बस ये घड़ा ही चाहिए, मैं इसे बहुत संभाल कर रखूँगा, कभी फूटने ही नहीं दूंगा। इस तरह 2 साल सेवा करने के बाद, युवक ने वो जादुई घड़ा प्राप्त कर लिया, और अपने घर पहुँच गया। उसने घड़े से अपनी हर इच्छा पूरी करवानी शुरू कर दी, महल बनवाया, नौकर चाकर मांगे, सभी को अपनी शान शौकत दिखाने लगा, सभी को बुला-बुला कर दावतें देने लगा और बहुत ही विलासिता का जीवन जीने लगा, उसने शराब भी पीनी शुरू कर दी और एक दिन नशें में, घड़ा सर पर रख नाचने लगा और ठोकर लगने से घड़ा गिर गया और फूट गया. घड़ा फूटते ही सभी कुछ गायब हो गया, 
अब युवक सोचने लगा कि काश मैंने जल्दबाजी न की होती और घड़ा बनाने की विद्द्या सीख ली होती, तो आज मैं, फिर से कंगाल न होता।

“ईश्वर हमें हमेशा 2 रास्ते पर रखता है एक आसान – जल्दी वाला और दूसरा थोडा लम्बे समय वाला, पर गहरे ज्ञान वाला, ये हमें चुनना होता है की हम किस रास्ते पर चलें” .  इस कथा का सार यह है है कि   ” कोई भी काम जल्दी में करना अच्छा नहीं होता, बल्कि उसके विषय में गहरा ज्ञान आपको अनुभवी बनाता है “

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अंग दान महादान : क्योंकि मृत्यु के पश्चात भी जीवन है ?



मृत्य के बाद भी हम किसी को जीवन दे सकते हैं, अपने आवश्यक अंगों को किसी  जरूरतमंद को दान कर । हमारे समक्ष ऐसे कई उदाहरण हैं जब किसी मृत व्यक्ति के शरीर के अंगों को किसी दूसरे बीमार, रुग्ण व्यक्ति के शरीर में समय रहते प्रत्यारोपण कर उन्हें नया जीवन मिला है। बेंगलुरु का ढाई-वर्षीय बालक जिसे काल ने समय से पहले ही अपना ग्रास बना लिया , आज  हम सभी देशवासियों  के लिए आदर्श बन चूका है। धन्य हैं उसके माता-पिता जिन्होंने अपने मासूम बच्चे के असामयिक मृत्यु की वेदना से आहत होने के पश्चात भी संयम रख उसके अत्यावश्यक शरीर के अंगों को दान कर किसी दूसरे माँ-बाप के लाडले को नया जीवन दिया। 

ज्ञात हो इस ढाई-वर्षीय बच्चे के असामयिक मृत्यु के पश्चात, उसके  हृदय को चेन्नई के एक  अस्पताल में भर्ती  एक रुसी बच्चे के शरीर  में प्रत्यारोपण कर नया जीवन प्रदान किया है। ह्रदय के अलावा, इस बच्चे के कॉर्निया, लीवर, आँख एवं गुर्दे को भी विभिन्न अस्पतालों को दान कर, उसके माता-पिता ने  मानवता का अद्भुत उदाहरण  स्थापित किया है।  ऐसे सराहनीय प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। 

आवश्यकता है,  देशवासियों को ऐसे उत्कृष्ट आदर्शों से सिख लेने की।  आइये हम सब अपने एवं अपने कुटुम्बों के मृत्यु के पश्चात अंग दान का संकल्प लें और मृत्यु के चौखट पर खड़े लोगों को अंग प्रत्यारोपण से नया जीवन दें। मृत्योपरांत  हमारा अंग दान उन हज़ारो, लाखों लोगों को अंग प्रत्यारोपण के द्वारा  उनके असामयिक मृत्यु को रोकने में कारगर होगा। 

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Friday, 19 December 2014

श्रम का पुरस्कार

बहुत दिनों पहले की बात है, गिलहरी पूरी तरह काली हुआ करती थी। छोटी-छोटी झाड़ियों के बीच, घास के मैदानों में, ऊँचे बड़े पेड़ों पर रेंगती फिरती कूदती फाँदती लेकिन लोग उसे सुंदर प्राणी नहीं समझते थे। गिलहरी को गाँव के परिवारों के साथ रहना पसंद था लेकिन गाँव वाले उसे पसंद नहीं करते थे। वह घरों में पहुँच जाती तो बच्चे डर जाते और लोग उसे भगाने लगते। 

गाँव में एक आश्रम था जिसमें साधू बाबा रहते थे। गिलहरी उनके पास रहने लगी। जो बाबा खाते वह गिलहरी खाती, जो वे यज्ञ हवन करते उसकी साक्षी बनती और जो वे जप मंत्र पढ़ते उसके पुण्य का लाभ उठाती। धीरे धीरे गिलहरी बीज, कंद और मूल खाने वाली साध्वी बन गई। कुछ समय बाद बाबा रामेश्वरम की तीर्थयात्रा पर निकले तो वह गिलहरी भी उनके साथ हो ली। रामेश्वरम के समुद्र तट पर बाबा ने जहाँ डेरा डाला वहीं किसी पेड़ पर एक कोटर में गिलहरी ने भी अपना घर बना लिया। 

रामेश्वरम में थोड़ा ही समय बीता था कि राम और रावण का युद्ध छिड़ गया और राम जी ने सिंधु में सेतु निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। नल और नील के नेतृत्व में बन्दर और भालू समुद्र में पत्थर डालकर सेतु बनाने लगे। यह देखकर गिलहरी भी रेत के कण उठाकर समुद्र में डालने लगी। यह छोटा सा काम था लेकिन बड़े निर्माण में छोटे से छोटे काम का महत्व होता है, यह समझकर नल नील ने उसे टोका नहीं और वह अपना काम करती रही। भगवान राम भी उसे चुपचाप काम करते देखते। जिस दिन पुल का निर्माण पूरा हुआ, उस दिन, नन्हीं सी गिलहरी द्वारा प्रदर्शित उत्तरदायित्व, लगन और श्रम की भावना को पुरस्कृत करने के लिये भगवान राम ने उसे अपने हाथों में उठाया और आशीर्वाद से भरी अपनी अँगुलियों को उस पर फेरा।

आश्चर्य ! भगवान राम के हाथ और ऊँगलियों के निशान जहाँ लगे वहाँ का रंग भगवान की त्वचा जैसा साँवला हो गया और वह अत्यंत आकर्षक दिखाई देने लगी। कहते हैं तभी से गिलहरी की गणना सुंदर प्राणियों में होने लगी। गाँव के बच्चे उसे देखकर खुश हो जाते, उसे बगीचों से कोई नहीं भगाता और लोग उससे खूब प्रेम करते। गिलहरी को मिले इस वरदान से उसके आगे की संतति भी सुंदर हुई। अंत में जब सेतु निर्माण का इतिहास लिखा गया तब हर कवि और रचनाकार ने उस नन्हीं गिलहरी का उल्लेख अपनी रचना में किया।

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Saturday, 13 December 2014

हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करें

एक दिन एक किसान का गधा कुएं में गिर गया। वह गधा घंटों जोर-जोर से रेंकता (गधे के बोलने की आवाज) रहा से और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। आखिर उसने निर्णय लिया कि गधा काफी बूढा हो चूका था, उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था इसलिए उसे कुएं में ही दफना देना चाहिए।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएं में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है, वह और जोर से चीख कर रोने लगा। और फिर, अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।

सब लोग चुपचाप कुएं में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएं में झांका तो वह हैरान रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे वह हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह गधा कुएं के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया।

इस प्रेरक प्रसंग  है कि आपके जीवन में भी बहुत तरह कि मिट्टी फेंकी जाएगी, बहुत तरह कि गंदगी आप पर गिरेगी। जैसे कि, आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा, कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में ही भला बुरा कहेगा ।

कोई आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में आपको हतोत्साहित होकर कुएं में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हिल-हिल कर हर तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख लेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने आदर्शों का त्याग किए अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

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Wednesday, 10 December 2014


मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता। इंसानी अधिकारों को पहचान देने और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए, अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्‍ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।  पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों को रोकने, उसके खिलाफ संघर्ष को नई परवाज देने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है। हमारे देश में व्यक्तिगत जीवन के लिए मानवाधिकार की महत्ता को समझते हुए भारत सरकार द्वारा 12 अक्टूबर, 1993 में मानवाधिकार आयोग नामक एक स्वायत्त संस्था का गठन मनुष्य को उपलब्ध मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए किया गया। परन्तु दुर्भाग्यवश हमारे देश में इन संस्थाओं के बावजूद, मानव अधिकारों के हनन की अनगिनत घटनाएँ देखने को मिलती हैं।  आजके इस महत्वपूर्ण अवसर पर, आइये हम सब मानव आधिकारों को अक्षुण रखने का संकल्प लें जिससे कि देश का हर व्यक्ति प्रदत्त मानवीय अधिकारों से वंचित ना रह पाये। 

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Monday, 8 December 2014

मार्मिक कहानी कहानी एक गलती की

एक बार कुछ विद्यार्थी रसायन विज्ञानं प्रयोगशाला में कुछ प्रयोग कर रहे थे. सभी विद्यार्थी अपने अपने प्रयोगों में व्यस्त थे कि अचानक एक लड़के की परखनली से तेज बुलबुला उठा और उसकी छिट्कियाँ सामने प्रयोग कर रही लड़की की आँखों में चला गया.
पूरी प्रयोगशाला में हाहाकार मच गया, सभी खूब परेशांन हुए, आनन फानन में उस लड़की को अस्पताल पहुँचाया गया, वहाँ डाक्टरों ने बताया कि वो अपनी आँखें खो चुकी है. ये सुन कर उस लड़की के घर वालों ने उस लड़के को कोसना शुरू कर दिया और स्कूल वालों ने उस लड़के को स्कूल से निकाल दिया.
अब वो अंधी लड़की अपनी नीरस ज़िन्दगी बिता रही थी, जो शायद किसी की लापरवाही की वजह से वीरान सी हो गयी थी, अब उस लड़की की ज़िन्दगी में कोई भी रंग कोई मायने नहीं रखता था. घर वाले भी वक़्त बेवक्त उस लड़के को कोसते रहते थे जिसने उनकी लड़की की ज़िन्दगी खराब कर दी थी. आज कल के ज़माने में तो किसी के सामने हूर परी भी बैठा दो तो भी लड़के वालों को उससे भी ज्यादा खूबसूरत चाहिए होती है. फिर उस बिचारी की वीरान ज़िन्दगी में रंग भरने की बात सोच पाना भी असंभव सा था. खैर वक़्त बीतता गया और उस लड़की को उस वीराने की आदत हो गयी. क्योंकि अब उसकी ज़िन्दगी में कही से भी उजाला आने की कोई गुंजाइश नहीं थी.
अचानक एक दिन एक बड़े इंजीनियर का रिश्ता उस अंधी लड़की के घर आया. यही नहीं लड़का खुद उसके घरवालों से उसका हाथ मांगने अपने माँ बाप के साथ आया था. घर वाले मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे कि बैठे बिठाये उन्हें अपनी अंधी लड़की के लिए लड़का मिल गया लेकिन लड़की इस बात से काफी दुखी थी. शायद इसलिए कि वो किसी की ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती थी. इसलिए उसने लड़के को अन्दर बुलाया और बोली कि मैं अंधी हूँ आपके घर का कोई काम मैं नहीं कर पाउंगी, आपको मुझसे कोई सुख नहीं मिल पायेगा, आप एक इंजीनियर हैं इसलिये आपको तो एक से बढ़कर एक लड़कियां मिल जायेंगी. आप प्लीज़ अपनी ज़िन्दगी खराब मत कीजिये. इस पर वो लड़का आगे बढ़ा और घुटनों के बल बैठकर लड़की का हाथ पकड़कर बोला :
प्लीज़ तुम इस शादी के लिए हाँ कहके मुझे मेरा प्रायश्चित कर लेने दो, मैं वही हूँ जिसने तुम्हारी ज़िन्दगी वीरान की है और आज मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ. प्लीज़ मना मत करना. ये सुन कर वो लड़की रोने लगती है, ये सोच कर नहीं कि उसकी ज़िन्दगी खराब करने वाला उससे शादी करना चाहता है. बल्कि ये सोच कर कि इस दुनिया में ऐसे लोग भी है जो अपनी गलती को स्वीकारना जानते हैं ।

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Wednesday, 3 December 2014

ज़िन्दगी का कड़वा सच

एक भिखारी था| वह न ठीक से खाता था, न पीता था, जिस वजह से उसका बूढ़ा शरीर सूखकर कांटा हो गया था| उसकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी| उसकी आंखों की ज्योति चली गई थी| उसे कोढ़ हो गया था| बेचारा रास्ते के एक ओर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए भीख मांगा करता था| एक युवक उस रास्ते से रोज निकलता था| भिखारी को देखकर उसे बड़ा बुरा लगता| उसका मन बहुत ही दुखी होता| वह सोचता, वह क्यों भीख मांगता है? जीने से उसे मोह क्यों है? भगवान उसे उठा क्यों नहीं लेते? एक दिन उससे न रहा गया| वह भिखारी के पास गया और बोला - "बाबा, तुम्हारी ऐसी हालत हो गई है फिर भी तुम जीना चाहते हो? तुम भीख मांगते हो, पर ईश्वर से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें अपने पास बुला ले?"

भिखारी ने मुंह खोला - "भैया तुम जो कह रहे हो, वही बात मेरे मन में भी उठती है| मैं भगवान से बराबर प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं| शायद वह चाहता है कि मैं इस धरती पर रहूं, जिससे दुनिया के लोग मुझे देखें और समझें कि एक दिन मैं भी उनकी ही तरह था, लेकिन वह दिन भी आ सकता है, जबकि वे मेरी तरह हो सकते हैं| इसलिए किसी को घमंड नहीं करना चाहिए|"

लड़का भिखारी की ओर देखता रह गया| उसने जो कहा था, उसमें कितनी बड़ी सच्चाई समाई हुई थी| यह जिंदगी का एक कड़वा सच था, जिसे मानने वाले प्रभु की सीख भी मानते हैं|

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Tuesday, 2 December 2014

AIDS Day

AIDS Day: Let us show our love to those without hope
India has the third-highest number of people living with HIV in the world with 2.1 million Indians accounting for about four out of 10 people infected with the deadly virus in the Asia—Pacific region, according to a UN report. According to  UNAIDS,  19 million of the 35 million people living with the virus globally do not know their HIV—positive status and so ending the AIDS epidemic by 2030 will require smart scale—up to close the gap. At the end of 2013, there were an estimated 4.8 million people living with HIV across the region. Six countries - China, India, Indonesia, Myanmar, Thailand, and Vietnam - account for more than 90 per cent of the people living with HIV in the region.
On World AIDS Day today let each of us take a pledge to create an awareness among people about this deadly disease and show our love to those without hope and protect the generation of tomorrow.

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