Monday, 30 January 2017

सिख

रिटायर्ड मास्टर धुलचन्द जी अपनी नियमित सुबह की सैर से घर लौटकर स्नान एवं पूजा-पाठ आदि कार्य करने के बाद अपने एकमात्र पुत्र कमल के कक्ष में जाते हैं | सुबह की दस बज चुकी है , कमल अभी भी सो रहा है , उसे देखकर मास्टर धुलचन्द मन ही मन क्रोधित होकर , अपने विद्यार्थियों को पढाए आदर्श जीवन के सिद्धांतों को अपने ही घर में ध्वस्त होते देख दुखी हो जाते हैं | अपनी भावनाओं को काबू करते हुए अपने पुत्र को जगाने का प्रयास करते हैं , कमल झल्ला कर जागता है और ‘जल्दी’ जगाने का कारन पूछता है | मास्टर जी अपने बेरोजगार बेटे को हाथ में तीन हजार रूपए देते हैं जो कि उनकी मासिक पेंशन में से अन्य सभी भुगतानों को काट कर शेष बची रकम है | रुपयों के साथ घर के मासिक राशन की सूचि भी देते हैं और कहते हैं की घर का राशन खत्म हो चूका है , आज ले आना नहीं तो आज घर में खाना नहीं बन पाएगा |  कमल बिना कोई जवाब दिए , बाथरूम की ओर बढ़ जाता है , मास्टर जी भी मन-मसोज कर घर से बाहर निकल जाते हैं |
        कुछ देर बाद कमल तैयार होकर घर से राशन लेने निकलता है , रास्ते में मौहल्ले के कुछ शराबी दोस्त मिलते हैं | कुछ इधर-उधर की बातों के बाद दोस्ती का वास्ता देकर कमल को भी अपने साथ शराब पीने ले जाते हैं | मौहल्ले के एक खाली मैदान में शराब का लम्बा दौर चलता है , सभी नशे में धुत्त हो जाते हैं , इतने में एक दोस्त अपनी जेब से ताश की गड्डी निकाल कर सभी से जुआ खेलने की मंशा जाहिर करता है | सभी दोस्त जुआ खेलने लगते हैं , कमल भी अपनी जेब में रखे राशन के रुपयों से जुएँ की बाजियां लगाने लगता है |
    तभी वहां से पुलिस की गाड़ी गश्त पर निकलती है | शराबियों को जुआ खेलते देख पुलिस के जवान सभी को पकडकर थाने ले आते हैं और उनसे मिला सारा रुपया जब्त कर लेते हैं |
    रात होने को है , उधर मास्टर धुलचन्द भूख से व्याकुल होकर अपने पुत्र कमल के राशन लेकर आने की राह देख रहे हैं | तभी मौहल्ले का कोई लड़का आकर कमल के दोस्तों के साथ जुआ खेलने के अपराध में थाने में बंद होने की खबर मास्टर जी को देता है | भूखे मास्टर जी अपनी दिवंगत पत्नी को याद करते हैं और दुखी मन से चल पड़ते हैं अपने पुत्र के कृत्य पर शर्मिंदा होने थाने की ओर |
    -थाने जाकर क्या होगा , कमल की जमानत कैसे होगी , मासिक राशन का क्या होगा ये सोचकर भूखे मास्टर जी की आँखे भर आती हैं |  


( इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है कि संस्कारी पृष्ठभूमि से होने के बाद भी कुसंगति एवं बुरी आदतें मनुष्य को पथभ्रष्ट ही नहीं करती वरन  नष्ट भी कर सकती हैं | इसलिए हमें इन बुराइयों से सदैव दुरी बनाए रखना चाहिए ) 

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Sunday, 29 January 2017

गुरु का स्थान

एक राजा था. उसे पढने लिखने का बहुत शौक था. एक बार उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की. शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा. राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए, मगर राजा को कोई लाभ नहीं हुआ. गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था. राजा बड़ा परेशान, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्द और योग्य गुरु थे. आखिर में एक दिन रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये.

 राजा ने एक दिन हिम्मत करके गुरूजी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, ” हे गुरुवर , क्षमा कीजियेगा , मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों है ?”
गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया, ” राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है…”
” गुरुवर कृपा कर के आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये “, राजा ने विनती की.
गुरूजी ने कहा, “राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने ‘बड़े’ होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान और दुखी हैं. माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं. आप हर दृष्टि से मुझ से पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है. गुरु होने के नाते मेरा स्थान आपसे उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं. बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है. आपके राजा होने के कारण मैं आप से यह बात नहीं कह पा रहा था.
कल से अगर आप मुझे ऊँचे आसन पर बैठाएं और स्वंय नीचे बैठें तो कोई कारण नहीं कि आप शिक्षा प्राप्त न कर पायें.”
 राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की . 




"इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि हमें अपने गुरु का सदैव सम्मान करना चाहिए एवम एक शिष्य के रूप में विनम्र होकर शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए "

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Friday, 27 January 2017

एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?

सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो. वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया.
लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.
सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”
लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना”
सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है

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Saturday, 21 January 2017

Keep intact your Peace of Mind & don’t allow it to get unsettled

Once Buddha was traveling with a few of his followers. While they were passing a lake, Buddha told one of his disciples, “I am thirsty. Do get me some water from the lake.”

The disciple walked up to the lake. At that moment, a bullock cart started crossing through the lake. As a result, the water became very muddy and turbid.

The disciple thought, “How can I give this muddy water to Buddha to drink?” So he came back and told Buddha, “The water in there is very muddy. I don’t think it is fit to drink.”

After about half an hour, again Buddha asked the same disciple to go back to the lake. The disciple went back, and found that the water was still muddy.

He returned and informed Buddha about the same. After sometime, again Buddha asked the same disciple to go back.

This time, the disciple found the mud had settled down, and the water was clean and clear. So he collected some water in a pot and brought it to Buddha.

Buddha looked at the water, and then he looked up at the disciple and said, ” See what you did to make the water clean. You let it be, and the mud settled down on its own, and you have clear water.”Your mind is like that too ! When it is disturbed, just let it be. Give it a little time. It will settle down on its own.

Friends,  our lives are like that. You don’t have to put in any effort to calm it down. It will happen. It is effortless.” Having ‘Peace of Mind’ is not a strenuous job, it is an effortless process so keep your mind cool and have a great life ahead…

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Wednesday, 18 January 2017

बुद्ध वाणी

    एक बार श्री गौतम बुद्ध किसी गाँव में भिक्षा मांगने जाते हैं , गाँव के एक घर के दरवाजे पहुंचकर भिक्षा  के लिए आवाज देते हैं | घर की मालकिन जो कि बड़े ही क्रोधी स्वभाव की  है , आवाज सुनकर दरवाजे पर पहुंचती है और दरवाजे पर खड़े श्री गौतम बुद्ध पर क्रोध के आवेश में आकर अपशब्दों की बारिश कर देती है | श्री गौतम बुद्ध बड़े ही शांत मन से उस महिला की बातों को सुनते हैं , कुछ देर बाद जब महिला का गुस्सा शांत होता है तो वह अपने कृत्य पर लज्जित होते हुए क्षमा याचना करती है और अपनी रसोई में से ताजा पकाया भात लाकर  श्री गौतम बुद्ध के भिक्षापात्र में डाल देती है | उसके बाद महिला श्री गौतम बुद्ध  से अपने अपशब्दों को सुनकर भी शांत रहने का कारण  पूछती है | श्री गौतम बुद्ध मुस्कुराकर कहते हैं के -हे माता आपने अभी जो भात मेरे भिक्षापात्र में डाला है यदि में उसे लेने से इंकार कर देता  तो वह किसके पास रहता  ? महिला कहती है कि यदि आप वो भात मुझ से नहीं लेते तो वह भात मेरे पास ही रहता | श्री गौतम बुद्ध कहते हैं , उसी प्रकार आपने जो अपशब्द मुझे कहे और मैंने ग्रहण नहीं करे तो वह भी आपके पास ही रहेंगे | महिला अपनी भूल पर एक बार फिर क्षमा याचना करती है  और भगवान बुद्ध भी महिला को क्षमा करते हुए  अपना आशीष प्रदान करते हैं  और  भात के लिए धन्यवाद देते हुए आगे बड़ जाते हैं |

इस प्रसंग से ये प्रेरणा मिलती है कभी भी क्रौध में आकर अपने विचारों को और शब्दों को दूषित नहीं करना चाहिए | सदैव विचारों में पवित्रता और वाणी में मधुरता बनाए रखना चाहिए “   

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Monday, 9 January 2017

असली सुख दौलत में नहीं, जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सेवा में है।


संत इब्राहिम अत्यंत नेक ईमानदार और प्रजा के सुख-दुख का ख्याल रखने वाले शासक थे। प्रजा की जरूरतों पर ध्यान देने के साथ-साथ वह भक्ति में भी लगे रहते थे। भक्ति से उनका अभिप्राय दुखी-दरिद्रों की सेवा से था। कुछ समय बाद वह सब कुछ त्याग कर फकीर बन गए और उन्होंने सेवा को ही अपना लक्ष्य मान लिया।
उनकी नेकी व कर्त्तव्यपरायणता की दूर-दूर तक प्रसिद्धि हो गई। बहुत से लोग इब्राहिम के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आने लगे। एक दिन एक व्यक्ति उनके पास ढेर सारा सोना लेकर आया और बोला,'यह मैं आपके लिए लाया हूं। इसे स्वीकार कर लीजिए।' संत इब्राहिम को उस व्यक्ति के व्यवहार में अहंकार नजर आया। वह उससे बोले,'मैं किसी गरीब की एक कौड़ी भी नहीं ले सकता।' वह व्यक्ति हैरानी से बोला,'मैं गरीब नहीं हूं। मेरे पास तो दौलत के कई भंडार हैं।' इस पर इब्राहिम ने कहा, 'माना कि तुम्हारे पास बहुत दौलत है, किंतु और दौलत पाने की तुम्हारी इच्छा बाकी है या खत्म हो गई?' वह व्यक्ति बोला,'आप तो जानते ही हैं कि दौलत ऐसी चीज है जिसकी चाह कभी खत्म नहीं होती।'
उस शख्स के जवाब पर इब्राहिम गंभीर होकर बोले,'इतनी दौलत का मालिक होते हुए भी तुम्हारी और दौलत पाने की इच्छा है। भला इस समय तुमसे गरीब आदमी और कौन हो सकता है? इसलिए इस समय तुम्हें ही इसकी अधिक जरूरत है। इसे तुम अपने पास ही रखो। मुझे नहीं चाहिए।' यह सुनकर वह व्यक्ति शर्मिंदा हो गया। उसने अपने बर्ताव के लिए माफी मांगते हुए कहा,'मैं समझ गया। असली सुख दौलत जमा करने में नहीं जरूरतमंदों व गरीबों को बांटकर उनका दु:ख-दर्द दूर करने में है।' इब्राहिम ने उसे माफ कर दिया। उसी क्षण उस व्यक्ति ने सच्चे मन से मनुष्य की सेवा का संकल्प लिया। मित्रों, असली सुख दौलत में नहीं, जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सेवा करने से मिलती है।

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