Monday, 27 July 2015

Adopt healthy lifestyle & say no to tobacco


According to a study by Indian Council of Medical Research,  'Head and Neck cancer' is among the top most cancers affecting Indian men and the third most common ailment among women. The National Centre for Disease Informatics and Research, Bengaluru in its report has stated that between 2007-2011, Head and neck cancer cases accounted for 30 and 10 percent of total cancers in males and females in the country.
Doctors say that  there has been an alarming increase in incidence of head and neck cancer cases over the past decade in developing countries like India and it is mainly due to alcohol consumption and tobacco. Fifty percent of head and neck cancers are oral cancers or mouth cancers which is the  commonest among all HNSC cancers. Around 50 per cent of the affected people die within 12 months of its diagnosis. Throat Cancer is next to oral cancer in terms of prevalence, it said.
However, if experts of the disease are to be believed  "almost 80 percent of the head and neck cancers are preventable since the majority of them are tobacco induced - smoke or the smokeless forms. To draw the world's attention to effective care and control of head and neck cancer, the International Federation of Head and Neck Oncologic Societies (IFHNOS)  has declared  July 27  as declared World Head Neck Cancer Day.


On This day, let us take pledge to say no to tobacco and adopt healthy lifestyle as stopping tobacco use and adopting a healthy lifestyle can prevent almost 80 percent of head and neck cancer cases in India.

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शब्द ब्रह्म है .....


शब्द ब्रह्म है। भारतीय दर्शकों में शब्द को उत्तम प्रमाण माना गया है। इस संदर्भ में एक अत्यंत प्रचलित कथा का उल्लेख करना यहां युक्तिसंगत होगा। कथा इस प्रकार है — दस व्यक्तियों ने बरसाती नदी पार की। पार पहुँचने पर यह जांचने के लिए कि दसों ने नदी पार कर ली है, कोई नदी में डूब तो नहीं गया, एक ने गिनना शुरू किया।

उसके अनुसार उनका एक साथी नदी में बह गया था। एक-एक करके सभी ने गिनती की, प्रत्येक का यही मानना था कि कोई बह गया है। सभी उस दसवें व्यक्ति के लिए रोने और विलाप करने लगे। वहाँ से गुज़र रहे एक बुद्धिमान व्यक्ति ने जब उनसे रोने तथा विलाप करने का कारण पूछा, तो उन्होंने सारी बात कह सुनाई। उस व्यक्ति ने उनको एक पंक्ति में खड़ा होने को कहा। जब सब पंक्ति में खड़े हो गए, तब उनमें से एक को बुलाकर उससे गिनने को कहा। उस व्यक्ति ने नौ तक गिनती गिनी और चुप हो गया।

तब आगन्तुक ने कहा दसवें तुम हो’ इतना सुनते ही सारा रोना-विलाप करना अपने आप, बिना किसी प्रयास के समाप्त हो गया। आगंतुक ने क्या किया ? उसके शब्दों ने ही रोने-बिलखने को विदाई दिलवा दी। 

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Saturday, 25 July 2015

जाति से नहीं कर्म से होती है पहचान

एक दिन राजकुमार अभय कुमार को जंगल में नवजात शिशु मिला। वह राजकुमार उसे अपने घर ले आया और उसका नाम जीवक रख लिया। अभय कुमार ने बच्चे को खूब पढ़ाया-लिखाया। जब जीवक बड़ा हुआ तो उसने अभय कुमार से पूछा, 'मेरे माता-पिता कौन हैं?' अभय कुमार ने उस जीवक से कुछ भी छिपाना ठीक न समझते हुए उसे सारी बात बता दी। लेकिन यह सुनकर जीवक बोला, 'मैं आत्महीनता का भार लेकर कहां जाऊं।'

इस बात पर अभय कुमार ने कहा, तुम तक्षशिला विद्या अध्ययन करने जाओ। जीवक विद्या अध्ययन के लिए चल पड़ा। विद्यालय में प्रवेश करते समय वहां के आचार्य ने जीवक से पूछा, 'बेटा! तुम्हारे माता-पिता का क्या नाम है? तुम्हारा कुल क्या है ? तुम्हारा गोत्र क्या है ?' इस सभी प्रश्नों के उत्तर जीवक ने सही-सही दिए। इस बात से प्रसन्न होकर आचार्य ने जीवक को विद्यालय में प्रवेश दे दिया। जीवक ने वहां कठोर परिश्रम करते हुए आयुर्वेदाचार्य की उपाधि ली। उसके आचार्य चाहते थे कि जीवक मगध जाकर वहां लोगों का उपचार करे। जब यह बात जीवक को पता चली तो उसने आचार्य से कहा, मैं जहां भी जाउंगा तो लोग मेरे माता-पिता और कुल-गोत्र के बारे में पूछेंगे। मैं यहीं रहना चाहता हूं।

किन आचार्य बोले, 'तुम्हारी प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारा कुल और गोत्र है। तुम जहां भी जाओगे वहां तुम्हें सम्मान मिलेगा। तुम लोगों की सेवा करोगे। इसी से तुम्हारी पहचान बनेगी। क्योंकि कर्म से ही मनुष्य की पहचान होती है, कुल और गोत्र से नहीं।' इस तरह का आत्मविश्वास फिर से जाग गया और वह आर्युवेदाचार्य के रूप में पूरे मगध राज्य में प्रसिद्ध हो गया।

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Monday, 20 July 2015

पानी की कीमत को समझें


एक दिन बापू गंगा तट पर कपड़े धो रहे थे। वह हर चीज का उतना ही उपयोग करते थे जितना करना चाहिए। बापू नदी से पानी लेकर कपड़ों में डाल रहे थे। वह कपड़ों को नदी से दूर धो रहे थे ताकि कपड़ों की गंदगी नदी में न जाए। पास ही अनेक ग्रामीण स्नान कर रहे थे और अपने-अपने कामों में लगे थे। बापू देख रहे थे कि लोग जरूरत से ज्यादा पानी ले रहे हैं और उसे व्यर्थ ही बहा रहे हैं। वह लोगों को बिना कुछ बोले इस बारे में बताना चाहते थे। इसलिए चुपचाप अपने काम में लगे हुए थे।

एक ग्रामीण बहुत देर से बापू को देख रहा था। उसने महसूस किया कि बापू नदी से थोड़ा सा पानी लेते हैं और उसे कपड़ों पर डालते हैं। कुछ देर बाद वह बोला,'बापू जी, एक बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। नदी में तो पानी अपार है। फिर पानी लेने में भी आप कंजूसी क्यों बरत रहे हैं? गंगा मैया में पानी की कमी थोड़े ही है। इसका प्रयोग तो जी भर के करिए।' ग्रामीण को ऐसा बोलते देख दूसरे लोग भी उसकी हां में हां मिलाने लगे।

उन्हें ऐसा बोलते देख बापू बोले, 'आप गलत कह रहे हैं। यदि सभी लोग ऐसे ही पानी बर्बाद करते रहे तो एक दिन गंगा नदी गायब ही हो जाएगी। फिर कहां से पानी व्यर्थ बहाओगे और कैसे गंगा मैया की पूजा करोगे?' बापू की बात सुनकर वहां उपस्थित लोग खामोश रह गए। उन्हें समझ आ गया कि बापू क्यों पानी को भी तोल-मोल कर प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने बापू से वादा किया कि आगे से वह पानी का सदुपयोग करेंगे और उसे व्यर्थ नहीं गंवाएंगे।

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Monday, 13 July 2015

क्रोध ही राक्षस है

श्रीकृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम और मित्र सात्यकि एक घने वन से होकर गुजर रहे थे। रात वन में ही ठहर गए। लेकिन उस वन में हिंसक पशुओं के साथ राक्षसों का भी डर था, इसलिए तय हुआ कि रात के तीनों प्रहर वे तीनों बारी-बारी से पहरा देंगे और चौथे प्रहर आगे चल पड़ेंगे। प्रथम प्रहर में सात्यकि पहरे पर थे। श्रीकृष्ण व बलराम सो रहे थे। तभी एक भयंकर राक्षस आया। उसने आक्रमण करने की कोशिश की तो सात्यकि को क्रोध आ गया। वे उससे लड़ने लगे।
ज्यों-ज्यों सात्यकि ज्यादा क्रोध करते राक्षस का आकार व बल और बढ़ जाता। राक्षस ने सात्यकि को घायल कर दिया। जब प्रथम पहर बीत गया तो राक्षस अदृश्य हो गया। तब सात्यकि ने बलराम को जगाया। जब बलराम पहरा देने लगे तो उनके साथ भी वैसा ही हुआ। दूसरा प्रहर बीतने पर श्रीकृष्ण उठे। जब राक्षस उनके सामने आया तो क्रोध करने के बजाय वे हंसने लगे। उनके हंसने से राक्षस का बल घटने लगा, साथ ही उसके शरीर का आकार छोटा होने लगा।
राक्षस जितनी तेजी से झपटता श्रीकृष्ण उतनी ही नरमी से उसके वार को झेलते हुए हंस पड़ते। धीरे-धीरे राक्षस एक कीड़े जितना छोटा हो गया। श्रीकृष्ण ने उसे अपने दुपट्टे के छोर में बांध लिया। चौथे प्रहर जब सात्यकि और बलराम उठे तो श्रीकृष्ण ने उनकी घायल अवस्था का कारण पूछा। उन्होंने राक्षस की बात बताई। तब श्रीकृष्ण दुपट्टे में बंधे कीड़े को दिखाते हुए बोले- यही है वह राक्षस। वस्तुत: क्रोध ही राक्षस है। जितना क्रोध आप करते गए, यह उतना बढ़ता गया। मैंने क्रोध नहीं किया तो यह छोटा हो गया। क्रोध न करें तो उसका विस्तार नहीं हो सकता।

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Saturday, 11 July 2015

दुनिया एक सराय है।


एक राज्य में एक राजा रहता था जो बहुत घमंडी था । उसके घमंड के चलते आस पास के राज्य के राजाओं से भी उसके संबंध अच्छे नहीं थे । उसके घमंड की वजह से सारे राज्य के लोग उसकी बुराई करते थे । एक बार उस गाँव से एक साधु महात्मा गुजर रहे थे उन्होंने ने भी राजा के बारे में सुना और राजा को सबक सिखाने की सोची।

साधु तेजी से राजमहल की ओर गए और बिना प्रहरियों से पूछे सीधे अंदर चले गए । राजा ने देखा तो वो गुस्से में भर गया । राजा बोला – ये क्या उदण्डता है महात्मा जी, आप बिना किसी की आज्ञा के अंदर कैसे आ गए? साधु ने विनम्रता से उत्तर दिया – मैं आज रात इस सराय में रुकना चाहता हूँ । राजा को ये बात बहुत बुरी लगी वो बोला -महात्मा जी ये मेरा राज महल है कोई सराय नहीं ,कहीं और जाइये ।

साधु ने कहा – हे राजा , तुमसे पहले ये राजमहल किसका था ? राजा – मेरे पिताजी का , साधु – तुम्हारे पिताजी से पहले ये किसका था ? राजा – मेरे दादाजी का । साधु ने मुस्करा कर कहा – हे राजा, जिस तरह लोग सराय में कुछ देर रहने के लिए आते है वैसे ही ये तुम्हारा राज महल भी है जो कुछ समय के लिए तुम्हारे दादाजी का था , फिर कुछ समय के लिए तुम्हारे पिताजी का था , अब कुछ समय के लिए तुम्हारा है ,कल किसी और का होगा , ये राजमहल जिस पर तुम्हें इतना घमंड है ये एक सराय ही है जहाँ एक व्यक्ति कुछ समय के लिए आता है और फिर चला जाता है ।

 
साधु की बातों से राजा इतना प्रभावित हुआ कि सारा राजपाट ,मान सम्मान छोड़कर साधु के चरणों में गिर पड़ा और महात्मा जी से क्षमा मांगी और फिर कभी घमंड ना करने की शपथ ली ।

मित्रों ,ये कहानी मात्र नहीं है बल्कि इस कहानी में एक बहुत बड़ी सीख छुपी हुई है । ये दुनिया एक सराय के समान है जहाँ कुछ लोग रोज आते हैं और कुछ लोग रोज जाते हैं । अच्छी सोच रखिये , अच्छे काम करिये क्यूंकि इस सराय से एक दिन सबको जाना है 

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