Thursday, 24 December 2015

भगवान दत्तात्रेय के सद्गुणों का चिंतन करना चाहिए

  हमारी यह भूमि वंदनीय है। यहां सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग तक स्वयं ईश्वर ने अवतार लिया है। सृष्टि रचयिता ने भक्ति-ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। कभी भक्ति का मर्म हमें समझाया तो कभी तत्व को आत्मसात करने की बात कही। ईश्वर अवतारों में भगवान दत्तात्रेय का अवतार बहुत पहले हुआ है। सतयुग के इस अवतार का प्रयोजन था व्यक्ति ज्ञान तत्व के माध्यम से विकास करे। श्री ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का एक स्वरुप भगवान दत्तात्रेय है, जो क्रमशः सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार के देवता है। वे सर्वशक्तिमान हैं, वे गुणातीत है। 
भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि एवं माता अनुसुइया के पुत्र है। हम देखते है कि कोई शिव को मानता है तो कोई विष्णु की उपासना करता है तो कोई इस प्रकृति को ही देव तत्व बनाता है। जब हम तीनों को एकत्र करते है तो वही भगवान दत्तात्रेय का चिंतन एवं स्मरण है। तीनों शक्तियों की एकरूपता हमें नवीन ऊर्जा प्रदान करती है। भगवान दत्तात्रेय तीनों स्वरूपों में हैं। प्रथम ब्रह्मा जो ज्ञान के रूप में हैं। ज्ञान को कर्म के रूप में सार्थक करने के लिए भगवान विष्णु हैं और कर्म को आचरण में लाकर उस आनंद अवस्था को समाधि में प्रकट करने के लिए महेश रूप है। इन तीनों तत्वों से मिलकर बना हुआ जीवन भगवान दत्तात्रेय कहा जाता है। उनकी भक्ति परंपरा, योग तत्व अति प्राचीन है, परंतु सद्गुणों को धारण करने के कारण वे आज भी शाश्वत हैं, स्मरणीय हैं।
भगवान दत्तात्रेय को स्मृतगामी इसलिए कहा जाता है कि उनके गुणों को चिंतन कर हम अपने गुणों को बढ़ाते हैं। सद्गुणों को धारण करने की प्रेरणा हमें भगवान दत्तात्रेय से प्राप्त होती है। योगी लोग उन्ही का ध्यान करते हैं। दत्तात्रेय का चिंतन ही ज्ञान प्राप्त कराकर इस जगत में रहते हुए निर्लिप्त रहने की प्रेरणा देता है। अपने जीवन में अनेक गुरुओं को बनाकर उन्होंने मानव जाति को निरंतर ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित किया है। इसी से आज तक व्यक्ति मानव कल्याण के कार्यो में रहकर अपना जीवन सफल मानता है।
सर्वशक्तिमान यह जानता है कि हमारे अंदर कौन सी भावना है, जो हमें मानव कल्याण की और ले जाती है। आज जहां हम अपने संबंधों को संकुचित कर लेते है और स्वार्थ के धरातल पर अपना चिंतन करते हैं तो यह चिंतन और स्वार्थपूर्ण जीवन हमें निश्चित ही पतन के रास्ते पर ले जाता है। व्यक्ति का पतन, समाज का पतन राष्ट्र के टुकडे-टुकडे कर देता है। हमारा राष्ट्र टुकडे-टुकडे होने से बचे, इसके लिए चिंतन का दायरा विस्तृत करना होगा। इसके लिए हमें भगवान दत्तात्रेय के सद्गुणों को आत्मसात करना होगा।
सद्गुरु दत्त सृष्टि के पालनहार है। वे ही सदैव वंदनीय हैं। दत्त अर्थात जगतगुरु, जो हमारे अंतर में गुरु तत्व स्थापित करता है। उनके उपदेशों को आचरण में लाने पर असीम शांति प्राप्त होती है। 'अ' अर्थात जो मध्य से अंत तक पवित्र है, 'व' अर्थात जिसने वासना का त्याग किया है, 'धू' अर्थात चित्त के पापों से दूर रहने वाला, 'त' अर्थात जिसने तत्व शक्ति को धारण किया हो। इस संसार में जितने भी तत्व है, उन सबके शक्तिपुंज भगवान दत्तात्रेय है। वे अपने चौबीस गुरुओं के लिए प्रसिद्ध है। गुरुओं के गुरु, जो गुरु तत्व को मनुष्य को प्रदान करते हैं। मनुष्य तो अज्ञानी है, उसे हर क्षण विनम्रता का भाव रखते हुए जीवन में सीखने की प्रेरणा लेना चाहिए। इसलिए कि हम अपने कर्म सोच-विचार कर करें। भगवान दत्तात्रेय के इसी भाव से हमारे अंतर में सेवा का भाव जाग्रत होता है। सेवा से त्याग और समर्पण की भावना प्रबल होती है। आज व्यक्ति अपने सुख के लिए सब कुछ चाहता है, परंतु दूसरों के लिए नहीं सोचता, इसलिए आज समाज का संतुलन बिगड़ रहा है।
सद्गुरु हमें सद्गुणी प्रवत्ति की और ले जाते हैं, यह प्रकृति सद्गुणी हैं। हमारे अंदर अवगुणों से अधिक सद्गुण हैं, फिर हम क्यों अपनी अवगुणी प्रवत्ति पर नियंत्रण नहीं कर पाते ? हमें विचार करना होगा कि भगवान दत्तात्रेय के कौन से गुण लेकर हम अच्छे इंसान बनकर मानवीय धर्म स्थापित कर सकते हैं। सद्गुरु दत्तात्रेय का मूल आधार ज्ञान दान है। एक तपस्वी को, एक ज्ञानी को यह देखना होगा कि वर्तमान में ऐसी कौन सी अवस्था है, जिसमें समाज का एक आधार हमारे सामने हो। इस समाज के पास आँखे हैं, परंतु दृष्टी नहीं। मात्र भाौतिक विकास के आधार पर आधुनिकता का आवरण ओढ़ना विकास नहीं हैं। विकास का अर्थ व्यक्ति का समुचित विकास, अंतर का विकास है। मानवता की मूल अभिव्यक्ति का आधार ज्ञान है। ज्ञान तत्व का नाम ही शिक्षा है।
सद्गुरु दत्तात्रेय प्रत्येक स्थिति में ज्ञानमयी हैं। ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। ज्ञान चर्चा का विषय न होकर आत्मसात करने की प्रक्रिया है। आनंद प्राप्त कर हम परमानंदी अवस्था को धारण कर सकते हैं। वर्तमान का चिंतन क्या है ? समाज में हमारे संबंधों का आधार क्या है ? यह हमें जानना होगा। सृष्टि से विश्व का निर्माण हुआ है। विश्व में अनेक राष्ट्रों से समाज, समाज से परिवार और व्यक्ति है। व्यक्ति को जीवन जीने के लिए आनंद है। रिश्ते, नाते है। उत्सव, पर्व है। भोग है, विलासिता है, ऐश्वर्य है, परन्तु अस्तित्व के लिए उसे सद्गुणी व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। हम अपने संतो के जीवन चरित्र को देखते हैं तो पाते है कि उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा, परंतु उन्होंने अपने त्यागमयी व्यक्तित्व के आधार पर अपने अंतरमन के आनंद को जगत में बाँटा है। यही ज्ञानमयी अवस्था है। जीवनमुक्त ज्ञानी जो अपने आत्म तत्व की अनुभूति करता है, उसकी साधना व्यर्थ नहीं जाती। उसका हर कार्य मानवीय कल्याण की भावना से होता है।
इसलिए दत्त जयंती महोत्सव पर हम परम योगेश्वर सद्गुरु दत्तात्रेय का स्मरण करें, उनकी वंदना करें, जिससे हमारे अंदर के सद्गुणों को वे ऊर्जा प्रदान करें और हम स्वस्थ समाज का निर्माण करें, यही उनके चरणों में विनती है।
॥ जय हिंद, जय धर्म 

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Monday, 21 December 2015

गुरु दक्षिणा


एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा-‘गुरु जी,कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है,कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं | इनमें कौन सही है?’गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं,मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं |’यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था| गुरु जी को इसका आभास हो गया |वे कहने लगे-‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ| ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे |’
उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए,ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं|वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’
अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा | वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था | अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |
वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’
तीनों ने सर झुका लिया |गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये |हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं |’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो |’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये |
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |’गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके | दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था |
अंततः,मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी |सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है |वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है |

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Monday, 14 December 2015

जीवन की दौड़

कुछ वर्ष पूर्व सीटल के विशेष ओलम्पिक खेलों की एक घटना है। मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम युवाओं की 100 मीटर की दौड़ के आयोजन का समय आ गया था। मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम प्रतिभागी बन्दूक की गोली चलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही गोली चली, सभी प्रतिद्वन्दी प्रारंभिक रेखा से भागे और जीतने की प्रबल इच्छा को लेकर आगे बढ़ने लगे। लेकिन एक छोटा लड़का लड़खड़ा कर शुरू में ही गिर गया और रोने लगा। बाकी आठ प्रतिभागियों ने उसके रोने की आवाज़ सुनी और उन आठों ने पीछे मुड़कर देखा।और फिर वह आठों के आठों वापस लौटे और उस बालक के पास पहुंचे। एक बालिका जो "डाउन्स सिन्ड्रोम" नामक बीमारी से ग्रसित होने के कारण मानसिक एवं शारीरिक रूप से असामान्य थी, झुकी और उसने उस छोटे से बालक को प्यार से चूमा और बोली, " अरे कोई बात नहीं , अब तुम बिल्कुल ठीक से दौड़ोगे ।"
और इसके बाद जो भी हुआ उसे देखकर स्टेडियम में बैठे सभी दर्शकों ने दांतों तले उंगली दबा ली। इसके बाद नौ के नौ प्रतिभागियों ने एक दूसरे के हाथ पकड़ कर एक साथ भागना शुरू किया और सबने एक साथ 100 मीटर की अन्तिम रेखा पार की।
इस दौड़ के समाप्त होने के पश्चात स्टेडियम में उपस्थित अपार जनसमूह खड़ा हो गया और सबने मिलकर काफ़ी देर तक तालियाँ बजा कर इन शारीरिक एवं मानसिक रूप से असामान्य प्रतिभागियों का मनोबल बढाया। जो लोग उस समय वहां उपस्थित थे वे आज तक अन्य लोगों को यह कहानी बड़े गर्व से सुनते हैं। क्यों ? क्योंकि मन ही मन वह जानते हैं की हमारे जीवन में स्वयं जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है जीतने में अन्य लोगों की मदद करना, चाहे ऐसा करने में उन्हें अपनी गति कुछ कम ही करनी पड़े। चाहे ऐसा करने में उन्हें अपना मार्ग ही कुछ क्यों न बदलना पड़े।

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Saturday, 12 December 2015

भावनाओं का सम्मान करें; मुफ्त की दी हुई वस्तुओं को मूल्यों से मत आंकें



एक समय की बात है। एक शहर में एक धनी आदमी रहता था। उसकी लंबी-चौड़ी खेती-बाड़ी थी और वह कई तरह के व्यापार करता था। 
बड़े विशाल क्षेत्र में उसके बगीचे फैले हुए थे, जहां पर भांति-भांति के फल लगते थे। उसके कई बगीचों में अनार के पेड़ बहुतायत में थे, जो दक्ष मालियों की देख-रेख में दिन दूनी और रात चौगुनी गति से फल-फूल रहे थे। उस व्यक्ति के पास अपार संपदा थी, किंतु उसका हृदय संकुचित न होकर अति विशाल था।
शिशिर ऋतु आते ही वह अनारों को चांदी के थालों में सजाकर अपने द्वार पर रख दिया करता था।
उन थालों पर लिखा होता था ‘आप कम से कम एक तो ले ही लें। मैं आपका स्वागत करता हूं।’
लोग इधर-उधर से देखते हुए निकलते, किंतु कोई भी व्यक्ति फल को हाथ तक नहीं लगाता था।
तब उस आदमी ने गंभीरतापूर्वक इस पर विचार किया और किसी निष्कर्ष पर पहुंचा। अगली शिशिर ऋतु में उसने अपने घर के द्वार पर उन चांदी के थालों में एक भी अनार नहीं रखा, बल्कि उन थालों पर उसने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘हमारे पास अन्य सभी स्थानों से कहीं अच्छे अनार मिलेंगे, किंतु उनका मूल्य भी दूसरे के अनारों की अपेक्षा अधिक लगेगा।’और तब उसने पाया कि न केवल पास-पड़ोस के, बल्कि दूरस्थ स्थानों के नागरिक भी उन्हें खरीदने के लिए टूट पड़े।
इस कथा का सार यह है कि अच्छी भावनाएँ अमूल्य होती हैं। भावना से दी जाने वाली अच्छी वस्तुओं को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता गलत है। सभी सस्ती या नि:शुल्क वस्तुएं या सेवाएं निकृष्ट नहीं होतीं। वस्तुत: आवश्यकता वह दृष्टि विकसित करने की है, जो भावना और व्यापार में फर्क कर सके और वस्तुओं की गुणवत्ता का ठीक-ठाक निर्धारण कर सके।

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Monday, 7 December 2015

सत्य पराजित नहीं हो सकता

सत्य के प्रति गांधीजी का आग्रह सबसे ऊपर रहता था। वह स्वयं तो इसका पालन करते ही थे, यह भी चाहते थे कि उनके करीबी लोग भी सदैव सत्य का पालन करते रहें। यह उन दिनों की बात है जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे और फिनिक्स आश्रम में रहते थे।
एक बार कुछ युवक उस आश्रम में रहने के लिए आए। उन युवकों ने एक विचित्र व्रत लिया। उन्होंने मिलकर निश्चय किया कि एक महीने तक वे बिना नमक वाला भोजन करेंगे। इसके लिए उन्होंने की प्रतिज्ञा भी कर ली। कुछ दिन तक तो वे अपनी प्रतिज्ञा पर बाकायदा अमल करते रहे, लेकिन शीघ्र ही वे सादे भोजन से उकताने लगे। जब इस तरह और चलाना मुश्किल हो गया तो एक दिन उन युवकों ने डरबन से मंगवाकर मसालेदार और स्वादिष्ट चीजें खा लीं।
लेकिन उन्हीं में से एक युवक ने बापू को यह सब बता भी दिया। बापू उस समय तो कुछ नहीं बोले, लेकिन प्रार्थना सभा में उन्होंने उन सब युवकों को बुलाकर खाने के बारे में पूछताछ की। लेकिन उन सबने मना कर दिया। उलटा उन लोगों ने भेद खोलने वाले साथी को ही झूठा ठहरा दिया।
बापू को युवकों की यह हरकत अच्छी नहीं लगी। 
वे जोरों से अपने गालों को पीटने लगे। फिर बोले- ‘मुझसे सचाई छिपाने में कसूर तुम्हारा नहीं, मेरा है। क्योंकि मैंने अभी तक सत्य का गुण प्राप्त नहीं किया है। इसलिए सत्य मुझसे दूर भागता है।’ बापू का यह बर्ताव देखकर युवकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे सब एक-एक करके बापू के चरणों में गिर पड़े और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इस कथा का सार यह कि सत्य को आप भले ही कुछ समय के लिए दबा दें, पर उसे  पराजित नहीं कर सकते। 

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