Monday, 17 October 2016

यह भी वक़्त बीत भी जायेगा।

एक बडी प्रसिद्ध सुफी कहानी है। एक सम्राट ने अपने सारे बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा – मैं कुछ ऐसे सुत्र चाहता हूं, जो छोटा हो, बडे शास्त्र नहीं चाहिए, मुझे फुर्सत भी नहीं बडे शास्त्र पढने की। वह ऐसा सुत्र हो जो एक वचन में पूरा हो जाये और जो हर घडी में काम आये। दूख हो या सुख, जीत हो या हार, जीवन हो या मृत्यु सब में काम आये, तो तुम लोग ऐसा सुत्र खोज लाओ। उन बुद्धिमानों ने बडी मेहनत की, बडा विवाद किया कुछ निष्कर्ष नहीं हो सका। वे आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा- हम बडी मुश्किल में पडे हैं बड़ा विवाद है, संघर्ष है , कोई निष्कर्ष नहीं हो पाया, हमने सुना हैं एक सूफी फकीर गांव के बाहर ठहरा है वह प्रज्ञा को उपलब्ध संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति है, क्यों न हम उसी के  पास चलें ?

वे लोग उस सुफी फकीर के पास पहूंचे उसने एक अंगुठी पहन रखी थी अपनी अंगुली में वह निकालकर सम्राट को दे दी और कहा – इसे पहन लो। इस पत्थर के नीचे एक छोटा सा कागज रखा है, उसमें सुत्र लिखा है, वह मेरे गुरू ने मुझे दिया था, मुझे तो जरूरत भी न पडी इसलिए मैंने अभी तक खोलकर देखा भी नहीं ।
उन्होंने एक शर्त रखी थी कि जब कुछ उपाय न रह जायें, सब तरफ से निरूपाय हो जाओं, तब इसे खोलकर पढना, ऐसी कोई घडी न आयी उनकी बडी कृपा है इसलिए मैंने इसे खोलकर पढा नहीं, लेकिन इसमें जरूर कुछ राज होगा आप रख लो। लेकिन शर्त याद रखना इसका वचन दे दो कि जब कोई उपाय न रह जायेगा सब तरफ से निरूपाय असहाय हो जाओंगे तभी अंतिम घडी में इसे खोलना।

क्योंकि यह सुत्र बडा बहुमूल्य है अगर इसे साधारणतः खोला गया तो अर्थहीन होगा। सम्राट ने अंगुठी पहन ली, वर्षो बीत गये कई बार जिज्ञासा भी हुई फिर सोचा कि कही खराब न हो जाए, फिर काफी वर्षो बाद एक युद्ध हुआ जिसमें सम्राट हार गया, और दुश्मन जीत गया। उसके राज्य को हडप लिया |
वह सम्राट एक घोडे पर सवार होकर भागा अपनी जान बचाने के लिए राज्य तो गया संघी साथी, दोस्त, परिवार सब छुट गये, दो-चार सैनिक और रक्षक उसके साथ थे वे भी धीरे-धीरे हट गये क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं था तो रक्षा करने का भी कोई सवाल न था।
दुष्मन उस सम्राट का पीछा कर रहा था, तो सम्राट एक पहाडी घाटी से होकर भागा जा रहा था। उसके पीछे घोडों की आवाजें आ रही थी टापे सुनाई दे रही थी। प्राण संकट में थे, अचानक उसने पाया कि रास्ता समाप्त हो गया, आगे तो भयंकर गडा है वह लौट भी नही सकता था, एक पल के लिए सम्राट स्तब्ध खडा रह गया कि क्या करें ?

फिर अचानक याद आयी, खोली अंगुठी पत्थर हटाया निकाला कागज उसमें एक छोटा सा वचन लिखा था यह वक़्त भी बीत जायेगा। सुत्र पढते ही उस सम्राट के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी उसके चेहरे पर एक बात का खयाल आया सब तो बीत गया, में सम्राट न रहा, मेरा साम्राज्य गया, सुख बीत गया, जब सुख बीत जाता है तो दुख भी स्थिर नहीं हो सकता।
शायद सुत्र ठीक कहता हैं अब करने को कुछ भी नहीं हैं लेकिन सुत्र ने उसके भीतर कोई सोया तार छेंड दिया। कोई साज छेड दिया। यह वक़्त भी बीत जायेगा ऐसा बोध होते ही जैसे सपना टुट गया। अब वह व्यग्र नहीं, बैचेन नहीं, घबराया हुआ नहीं था। वह बैठ गया।
संयोग की बात थी, थोडी देर तक तो घोडे की टांप सुनायी देती रहीं फिर टांप बंद हो गयी, शायद सैनिक किसी दूसरे रास्ते पर मूड गये। घना जंगल और बिहड पहाड उन्हें पता नहीं चला कि सम्राट किस तरफ गया है। धीरे-धीरे घोडो की टांप दूर हो गयी, अंगुठी उसने वापस पहन ली।
कुछ दिनों बार दोबारा उसने अपने मित्रों को वापस इकठ्ठा कर लिया, फिर उसने वापस अपने दुष्मन पर हमला किया, पुनः जीत हासिल की फिर अपने सिंहासन पर बैठ गया। जब सम्राट अपने सिंहासन पर बैठा तो बडा आनंदित हो रहा था।
तभी उसे फिर पुनः उस अंगुठी की याद आयी उसने अंगुठी खोली कागज को पढा फिर मुस्कुराया दोबारा सारा आनन्द विजयी का उल्लास, विजयी का दंभ सब विदा हो गया। उसके वजीरों ने पूछा- आप बडे प्रसन्न् थे अब एक दम शांत हो गये क्या हुआ ?
सम्राट ने कहा- जब सभी बीत जायेगा तो इस संसार में न तो दूखी होने को कुछ हैं और न ही सुखी  होने को कुछ है। तो जो चीज तुम्हें लगती हैं कि बीत जायेगी उसे याद रखना, अगर यह सुत्र पकड में आ जाये, तो और क्या चाहिए ? तुम्हारी पकड ढीली होने लगेगी। तुम धीरे-धीरे अपने को उन सब चीजों से दूर पाने लगोेगे जो चीजें बीत जायेगी क्या अकडना, कैसा गर्व, किस बात के लिए इठलाना, सब बीत जायेगा। यह जवानी बीत जायेगी |

याद बन-बन के कहानी लौटी, सांस हो-हो के विरानी लौटी
लौटे सब गम जो दिये दुनिया ने, मगर न जाकर जवानी लौटी।

यह सब बीत जायेगा। यह जवानी, युवा अवस्था,  यह दो दिन की इठलाहट, यह दो दिन के लिए तितलियों जैसे पंख यह सब बीत जाएंगे। यह दो दिन की चहल-पहल फिर गहरा सन्नाटा, फिर मरघट की शान्ति | मित्रों, हमारा यह जीवन सुखों एवं दुखों का संगम है। अतः ना तो हमें सुख के क्षणों में अति आनंदित होना चाहिए और ना दुःख के घड़ी में विलाप करनी चाहिए। जीवन में कुछ भी स्थिर नहीं।  जीवन में बुरा से बुरा वक़्त गुजर जाता है पर उन क्षणों में हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए। 

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Saturday, 8 October 2016

अहंकार को त्यागकर सीखना प्रारम्भ करें

मित्रों, धरती पर जन्म लेने के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, सीखने की प्रक्रिया भी विस्तार लेती जाती है, जल्द ही हम उठना, बैठना, बोलना, चलना सीख लेते हैं। इस बड़े होने की प्रक्रिया के साथ ही कभी-कभी हमारा अहंकार हमसे अधिक बड़ा हो जाता है और तब हम सीखना छोड़कर गलतियां करने लगते हैं। यह अंहकार हमारे विकास मार्ग को अवरूद्ध कर देता है। इस सन्दर्भ मैं आप सभी को एक कथा सुनाता हूँ।  

एक समय की बात है रूस के ऑस्पेंस्की नाम के महान विचारक एक बार संत गुरजियफ से मिलने उनके घर गए। दोनों में विभिन्न् विषयों पर चर्चा होने लगी। ऑस्पेंस्की ने संत गुरजियफ से कहा, यूं तो मैंने गहन अध्ययन और अनुभव के द्वारा काफी ज्ञान अर्जित किया है, किन्तु मैं कुछ और भी जानना चाहता हूं। आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं? गुरजियफ को मालूम था कि ऑस्पेंस्की अपने विषय के प्रकांड विद्वान हैं, जिसका उन्हें थोड़ा घमंड भी है अतः सीधी बात करने से कोई काम नहीं बनेगा। इसलिए उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक कोरा कागज उठाया और उसे ऑस्पेंस्की की ओर बढ़ाते हुए बोले- ''यह अच्छी बात है कि तुम कुछ सीखना चाहते हो। लेकिन मैं कैसे समझूं कि तुमने अब तक क्या-क्या सीख लिया है और क्या-क्या नहीं सीखा है। अतः तुम ऐसा करो कि जो कुछ भी जानते हो और जो नहीं जानते हो, उन दोनों के बारे में इस कागज पर लिख दो। जो तुम पहले से ही जानते हो उसके बारे में तो चर्चा करना व्यर्थ है और जो तुम नहीं जानते, उस पर ही चर्चा करना ठीक रहेगा।''
  
बात एकदम सरल थी, लेकिन ऑस्पेंस्की के लिए कुछ मुश्किल। उनका ज्ञानी होने का अभिमान धूल-धूसरित हो गया। ऑस्पेंस्की आत्मा और परमात्मा जैसे विषय के बारे में तो बहुत जानते थे, लेकिन तत्व-स्वरूप और भेद-अभेद के बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं था। गुरजियफ की बात सुनकर वे सोच में पड़ गए। काफी देर सोचने के बाद भी जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने वह कोरा कागज ज्यों का त्यों गुरजियफ को थमा दिया और बोले- श्रीमान मैं तो कुछ भी नहीं जानता। आज आपने मेरी आंखे खोल दीं। ऑस्पेंस्की के विनम्रतापूर्वक कहे गए इन शब्दों से गुरजियफ बेहद प्रभावति हुए और बोले - ''ठीक है, अब तुमने जानने योग्य पहली बात जान ली है कि तुम कुछ नहीं जानते। यही ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है। अब तुम्हें कुछ सिखाया और बताया जा सकता है। अर्थात खाली बर्तन को भरा जा सकता है, किन्तु अहंकार से भरे बर्तन में बूंदभर ज्ञान भरना संभव नहीं। अगर हम खुद को ज्ञान को ग्रहण करने के लिए तैयार रखें तो ज्ञानार्जन के लिये सुपात्र बन सकेंगे। ज्ञानी बनने के लिए जरूरी है कि मनुष्य ज्ञान को पा लेने का संकल्प ले और वह केवल एक गुरू से ही स्वयं को न बांधे बल्कि उसे जहां कहीं भी अच्छी बात पता चले, उसे ग्रहण करें।''

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Monday, 3 October 2016

Live a meaningful & purposeful life

A girl was standing on the roof of a high building. After finding out that her husband was cheating on her, she wanted to end with her life. After a short hesitation, she made a step forward. The girl fell fast towards the ground. But just before the death, the fear filled her soul. Suddenly she felt like she was in someone’s embrace. She opened her eyes and saw an angel, who was holding her in his hands.
– Why didn’t you let me fall? – She asked with anger.
– I will let you go if you agree to die understanding that there won’t be any memories of you left on earth, nothing.
– How is that? – asked the girl in surprise.
– You don’t have children, who would remember you, your mother is old and she will die soon. And everyone else…they will forget about you soon…
– And my husband? He will blame himself for my death. If he will feel remorse all his life, he will remember me.
– That won’t happen, he doesn’t love you, he is happy with another woman. And he won’t blame himself for a long time, soon he will forget you.
– Fine, I believe you. But I have things, photographs.
– Your apartment will burn down after one year. And all your things will turn into ash…
– But my friends have photos of me.
– You don’t have friends, – the angel said quite coldly.
– But… I am on the collective school photos.
Suddenly, the angel started to unclamp his hands.
– You are letting me go because I proved to you that there will be memories about me left? – The girl asked mockingly.
– No. You are clinging to the strings so hard; you are convincing me that I would let you die, just like others are clinging to some futile opportunities so that they could live. I don’t want to spend these moments with you, because I could help other people during that time. I want to give people a chance to live, not to die. So friends, the moral of this story is that live a meaningful and purposeful life, so that when you are no more in this world, people remember you for all your good works and keep you alive in their memories.

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Saturday, 1 October 2016

अपने शब्दों का चयन सोच समझ कर करें



मित्रों, एक कहावत प्रचलित है -- ”मुंह से निकले शब्द वापस नहीं लिए जा सकते ठीक वैसे ही जैसे धनुष से निकला हुआ तीर कभी वापस नहीं आता ” .  कहने का तात्पर्य यह कि  हमें बड़ी सावधानी से अपने शब्दों का  चयन  करना चाहिए।  बडबोलापन दोस्तों के बीच आपको जरूर लोकप्रियता दिला सकता है लेकिन कभी कभी ये नुकसानदेह होता है क्योंकि पहली बार हमसे मिलने के बाद जो छवि किसी इन्सान के लिए बनती है उसमें उससे हुई हमारी बातचीत का ही शत प्रतिशत योगदान होता है। चलिए इस सन्दर्भ में मैं आप सबको एक कहानी सुनाता हूँ। 

कहानी कुछ इस तरह है - एक आदमी ने किसी बात को लेकर अपने पडोसी को बहुत बुरा भला, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह अपने गलती का पश्चाताप करने चर्च गया।  वंहा जाकर पादरी के सामने  उसने ऍनकइ गलती को स्वीकार।  उसकी बातों को सुनकर पादरी ने उसे एक पंखो से भरा थैला दिया यह कहते हुए  कि वो इस थैले को किसी खुली जगह में जाकर बिखेर दे।  पादरी के कथनानुसार उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और जब लौटकर आया तो पादरी ने उसे कहा कि क्या तुम अब जाकर उन पंखो को  वापस इसी थैले में भरके ला सकते हो ? वो आदमी फिर उन पंखों को समेटने के लिए निकल पड़ा। उस स्थान पर जहाँ पर उसने पंखों को बिखेर था, उन पंखों को समेटने की बहुत  कोशिश की पर सफल नहीं हो पाया और मायूस होकर खाली थैला लिए पादरी के पास लौट परा।  पादरी ने उसके मन की दशा को देखते हुए उसे समझाया कि जिस तरह वो पंखों को वापस नहीं समेट सका, ठीक उसी तरह वो लाख पश्चाताप कर ले पर अपने द्वारा कहे गए शब्दों को वापस नहीं ले सकता।  मित्रों, इस कथा से अभिप्राय यह है  कि हम सभी को किसी से बात करते समय अपने द्वारा कहे गए शब्दों का चुनाव सावधानी से करनी चाहिए  क्योंकि कई बार हम अपनी शब्दों के कारण किसी को दुःख पहुंचते हैं और अपनी सफलता को असफलता में बदल देते हैं। 

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