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Monday, 13 July 2015

क्रोध ही राक्षस है

श्रीकृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम और मित्र सात्यकि एक घने वन से होकर गुजर रहे थे। रात वन में ही ठहर गए। लेकिन उस वन में हिंसक पशुओं के साथ राक्षसों का भी डर था, इसलिए तय हुआ कि रात के तीनों प्रहर वे तीनों बारी-बारी से पहरा देंगे और चौथे प्रहर आगे चल पड़ेंगे। प्रथम प्रहर में सात्यकि पहरे पर थे। श्रीकृष्ण व बलराम सो रहे थे। तभी एक भयंकर राक्षस आया। उसने आक्रमण करने की कोशिश की तो सात्यकि को क्रोध आ गया। वे उससे लड़ने लगे।
ज्यों-ज्यों सात्यकि ज्यादा क्रोध करते राक्षस का आकार व बल और बढ़ जाता। राक्षस ने सात्यकि को घायल कर दिया। जब प्रथम पहर बीत गया तो राक्षस अदृश्य हो गया। तब सात्यकि ने बलराम को जगाया। जब बलराम पहरा देने लगे तो उनके साथ भी वैसा ही हुआ। दूसरा प्रहर बीतने पर श्रीकृष्ण उठे। जब राक्षस उनके सामने आया तो क्रोध करने के बजाय वे हंसने लगे। उनके हंसने से राक्षस का बल घटने लगा, साथ ही उसके शरीर का आकार छोटा होने लगा।
राक्षस जितनी तेजी से झपटता श्रीकृष्ण उतनी ही नरमी से उसके वार को झेलते हुए हंस पड़ते। धीरे-धीरे राक्षस एक कीड़े जितना छोटा हो गया। श्रीकृष्ण ने उसे अपने दुपट्टे के छोर में बांध लिया। चौथे प्रहर जब सात्यकि और बलराम उठे तो श्रीकृष्ण ने उनकी घायल अवस्था का कारण पूछा। उन्होंने राक्षस की बात बताई। तब श्रीकृष्ण दुपट्टे में बंधे कीड़े को दिखाते हुए बोले- यही है वह राक्षस। वस्तुत: क्रोध ही राक्षस है। जितना क्रोध आप करते गए, यह उतना बढ़ता गया। मैंने क्रोध नहीं किया तो यह छोटा हो गया। क्रोध न करें तो उसका विस्तार नहीं हो सकता।

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