Saturday, 14 March 2015

ईश्वर सर्वव्यापी हैं

संत नामदेव अपने शिष्यों के साथ रोज की तरह धर्म चर्चा में लीन थे। तभी एक जिज्ञासु उनसे प्रश्न कर बैठा-"गुरूदेव, कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, तो उसे अनुभव कैसे किया जा सकता है? क्या आप उसकी प्राप्ति का कोई उपाय बता सकते हैं?" नामदेव यह सुनकर मुस्कराए। फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने को कहा। वहां उपस्थित शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई।

वे सोचने लगे, पता नहीं उनके गुरूदेव कौन सा प्रयोग करना चाहते हैं। नमक और पानी के आ जाने पर संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा। जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा- "बताओ, क्या तुम्हें इसमें नमक दिख रहा है?" जिज्ञासु बोला- "नहीं गुरूदेव, नमक तो इसमें पूरी तरह घुल-मिल गया है।" संत ने उसे पानी चखने को कहा। उसने चखकर कहा- "जी, इसमें नमक उपस्थित है, पर वह दिखाई नहीं दे रहा।" अब संत ने उसे जल उबालने को कहा। पूरा जल जब भाप बन गया तो संत ने पूछा- "क्या इसमें वह दिखता है?" जिज्ञासु ने गौर से लोटे को देखा और कहा-"हां, अब इसमें नमक दिख रहा है।" तब संत ने समझाया-"जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखता नहीं, उसी तरह ईश्वर भी हर जगह अनुभव किया जा सकता है, मगर वह दिखता नहीं। जिस तरह जल को गर्म करके तुमने नमक पा लिया, उसी प्रकार तुम भी उचित तप और कर्म करके ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो।" यह सुनकर सभी लोग संत नामदेव के प्रति नतमस्तक हो गए।
इस प्रसंग का  तात्पर्य यह कि ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं और हर  व्यक्ति   अपनी सच्ची निष्ठा, श्रद्धा, तप से ईश्वर की अनुभूति प्राप्त कर सकता है। 

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Thursday, 12 March 2015

1 in 10 adults suffering from kidney disease in India

According to reports, one in every 10 adults in India suffers from chronic kidney disease (CKD), and at any given point, nearly five lakh patients are in need of life-long dialysis or transplant.
Out of total kidney patients in India, only around 6,000 patients receive new kidney and another 30,000 can afford or get access to dialysis. For the remaining 4.5 lakh, there was no definitive treatment and their survival is difficult beyond a few weeks, according Nephrology experts.
Diabetics and those with high blood pressure constitute nearly 60 per cent of all CKD patients. The disease is more common than stroke and diabetes, and of a magnitude almost equal to diabetes. The cost of treatment for an average patient is many times more than treating diabetes and stroke.
However, “just two simple tests to check the level of protein in urine and a blood test for measuring serum creatinine once a year can help prevent the disease. Unfortunately there is abject lack of awareness among  people to go for  routine tests which can help prevent the disease to a large extent. Lack of trained manpower is another major  reason that hampers health-care delivery. Statistics suggests  that India has only 850 qualified nephrologists for a country of 1.2 billion people.
On World Kidney Day today, let each of us wake up to the enormity of this dreaded disease which is spreading  fast and has almost hit 17% of urban youths in India and must take preventive measures and avoid  risk factors which are contributing to spread of   disease in our  country. Let us take care of our kidneys, it  ages like us.

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Monday, 9 March 2015

जीवन दौड़




कुछ वर्ष पूर्व सीटल के विशेष ओलम्पिक खेलों की एक घटना है। मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम युवाओं की 100 मीटर की दौड़ के आयोजन का समय आ गया था। मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम प्रतिभागी बन्दूक की गोली चलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही गोली चली, सभी प्रतिद्वन्दी प्रारंभिक रेखा से भागे और जीतने की प्रबल इच्छा को लेकर आगे बढ़ने लगे। लेकिन एक छोटा लड़का लड़खड़ा कर शुरू में ही गिर गया और रोने
लगा। बाकी आठ प्रतिभागियों ने उसके रोने की आवाज़ सुनी और उन आठों ने पीछे मुड़कर देखा।और फिर वह आठों के आठों वापस लौटे और उस बालक के पास पहुंचे। एक बालिका जो "डाउन्स सिन्ड्रोम" नामक बीमारी से ग्रसित होने के कारण मानसिक एवं शारीरिक रूप से असामान्य थी, झुकी और उसने उस छोटे से बालक को प्यार से चूमा और बोली, " अरे कोई बात नहीं , अब तुम बिल्कुल ठीक से दौड़ोगे ।"और इसके बाद जो भी हुआ
उसे देखकर स्टेडियम में बैठे सभी दर्शकों ने दांतों तले उंगली दबा ली। इसके बाद नौ के नौ प्रतिभागियों ने एक दूसरे के हाथ पकड़ कर एक साथ भागना शुरू किया और सबने एक साथ 100 मीटर की अन्तिम रेखा पार की।
इस दौड़ के समाप्त होने के पश्चात स्टेडियम में उपस्थित अपार जनसमूह खड़ा हो गया और सबने मिलकर काफ़ी देर तक तालियाँ बजा कर इन शारीरिक एवं मानसिक रूप से असामान्य प्रतिभागियों का मनोबल बढाया। जो लोग उस समय वहां उपस्थित थे वे आज तक अन्य लोगों को यह कहानी बड़े गर्व से सुनते हैं। क्यों ? क्योंकि मन ही मन वह जानते हैं की हमारे जीवन में स्वयं जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है जीतने में अन्य लोगों की मदद करना, चाहे ऐसा करने में उन्हें अपनी गति कुछ कम ही करनी पड़े। चाहे ऐसा करने में उन्हें अपना मार्ग ही कुछ क्यों न बदलना पड़े। " क्या दूसरी मोमबत्ती जलाने के बाद पहली मोमबत्ती की रौशनी धीमी पड़ जाती है ? "नहीं न" । क्या दूसरी मोमबत्ती को बुझा देने से पहली मोमबत्ती ज्यादा तेज़ी से चमकने लगती है ? "

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Sunday, 8 March 2015

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी !!


"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥"
रावणके युद्धमें परास्त कर उसका वध कर , प्रभु श्री रामने माता सीता को मुक्त किए और विभीषणको लंकाकी राजगद्दीपर आसीन किए | उनके भाई लक्ष्मणने उनसे लंकामें कुछ और दिवस रुकनेके लिए कहा क्योंकि लंका अत्यधिक रमणीय स्थान था |तब प्रभु श्री रामने कहा कि स्वर्णमयी और सुंदर लंका में उन्हें आकृष्ट नहीं करती और उन्हें अपने जन्मभूमि वापिस जाना है क्योंकि जननी और जन्मभूमि दोनोंका ही स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है !
पर दुर्भाग्यवश आज हमारी जननी का अस्तित्व खतरे में है, बाबजूद इसके कि वो समाज के हर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी है। वो सशक्त होकर भी अबला बनी हुई है तो इसका सबसे बड़ा कारण है कि हमारा समाज आज भी महिलाओं के प्रति अपने सोच को नहीं बदल पाया है। यदि हमारी जननी को पुनः समाज में उनका सर्वोच्च स्थान दिलाना है तो हम सभी को उनके प्रति सोच बदलनी होगी, उन्हें वो सम्मान एवं आदर देनी होगी जिनकी वो हकदार हैं।
आज महिला दिवस पर हम सब महिलाओं की सुरक्षा और उनके कल्याण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का संकल्प लें । केवल कानून हमारी महिलाओं को स्वतंत्र माहौल नहीं दे सकते। हमारे मानसिक और नैतिक विचारों और साथ ही साथ सामाजिक व्यवहारों में मौलिक सुधारों की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं को हमेशा आदर और सम्मान दिया जाए।

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Monday, 2 March 2015

असफलता ही हमारे सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है ..............


सभी के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब सभी चीज़ें आपके विरोध में हो रहीं हों | चाहें आप एक प्रोग्रामर हैं या कुछ और, आप जीवन के उस मोड़ पर खड़े होता हैं जहाँ सब कुछ ग़लत हो रहा होता है| अब चाहे ये कोई सॉफ्टवेर हो सकता है जिसे सभी ने रिजेक्ट कर दिया हो, या आपका कोई फ़ैसला हो सकता है जो बहुत ही भयानक साबित हुआ हो |
लेकिन सही मायने में, विफलता सफलता से ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है | हमारे इतिहास में जितने भी उद्योगपति, वैज्ञानिक और महापुरुष हुए हैं वो जीवन में सफल बनने से पहले लगातार कई बार असफल हुए हैं | जब हम बहुत सारे कम कर रहे हों तो ये ज़रूरी नहीं कि सब कुछ सही ही होगा| लेकिन अगर आप इस वजह से प्रयास करना छोड़ देंगे तो कभी सफल नहीं हो सकते |
हेनरी फ़ोर्ड, जो अरबपति और विश्वप्रसिद्ध फ़ोर्ड मोटर कंपनी के मलिक हैं, सफल बनने से पहले फ़ोर्ड पाँच अन्य उद्योग में असफल हुए थे | उनकी जगह पर कोई और होता तो असफलता देखकर और कर्ज़ मे डूबने के कारण टूट जाता, लेकिन फ़ोर्ड ने ऐसा नहीं किया और आज एक बिलिनेअर कंपनी के मलिक हैं |
अगर विफलता की बात करें तो थॉमस अल्वा एडिसन का नाम सबसे पहले आता है| लाइट बल्व बनाने से पहले उसने लगभग 1000 विफल प्रयोग किए थे | अल्बेर्ट आइनस्टाइन जो 4 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे और 7 साल की उम्र तक निरक्षर थे। लोग उसको दिमागी रूप से कमजोर मानते थे, लेकिन अपनी सिद्धांतों के बल पर वो दुनिया का सबसे बड़े वैज्ञानिक बने |
ज़रा सोचिये अगर हेनरी फ़ोर्ड अपने पांचों प्रयास में असफल होने के बाद निराश होकर बैठ जाता, या एडिसन 999 असफल प्रयोग के बाद उम्मीद छोड़ देता और आईन्टाइन भी खुद को दिमागी कमजोर मान के बैठ जाते तो क्या होता? हम बहुत सारी महान प्रतिभाओं और अविष्कारों से अंजान रह जाते |
सार यह कि असफलता ही हमारे सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।

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