एक 25 वर्ष का लड़का ट्रेन में सफ़र करते समय खिड़की से बाहर के नज़ारे को देख
रहा था|वह अचानक चिल्लाया – “पापा, वो देखो पेड़ पीछे जा रहे है!”पिताजी
मुस्कराए | पास में बैठा एक व्यक्ति, लड़के के इस बचपने व्यवहार को देखकर
हैरान था और उसे लड़के पर दया आ रही थी|थोड़ी देर बाद लड़का फिर ख़ुशी से
चिल्लाया – “देखो पापा, बादल हमारे साथ चल रहे है!”अब पास में बैठे व्यक्ति
से रहा नहीं गया और उसने कहा – “आप अपने बेटे को किसी अच्छे डॉक्टर को
क्यों नहीं दिखाते?”लड़के के पिता ने कहा – “हम अभी अस्पताल से ही आ रहे है|
दरअसल मेरा बेटा जन्म से ही अँधा था और आज ही उसको आँखे मिली है| आज वह
पहली बार इस संसार को देख रहा है|”इस मार्मिक प्रसंग को पढ़ कर आपके मन में
भी विचारों का सृजन हुआ होगा। मित्रों, हर व्यक्ति की अपनी एक कहानी होती
है | सम्पूर्ण सच को जाने बिना किसी के भी व्यवहार के बारे में निर्णय नहीं
करना चाहिए | हो सकता है कि जो दिख रहा है वह सम्पूर्ण सच न हो
Monday, 11 January 2016
Saturday, 9 January 2016
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जो बदलता है वही आगे बढ़ता है
जीवन में अनुभवों से सीखकर स्वयं को बदलने की जरूरत होती है। अगर हम बदलना बंद कर देते हैं तो एक ही जगह रुक जाते हैं। जो बदलता है वही आगे बढ़ता है। जीवन को बदलाव की प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ता है। अगर बदलाव आपका लक्ष्य नहीं है तो फिर जीवन ठहर जाएगा। बदलाव नहीं होगा तो जीवन की धारा रुक जाएगी। हर अनुभव हमें प्रेम, धैर्य और आनंद प्राप्त करना सिखाता है। अनुभव ही हमें बहुत सी चीजें सिखाते हैं। हमारे विकास में सहायक होते हैं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम ‘संसार’ को ‘निर्वाण’ में बदलें। या दूसरे शब्दों में कहें कि ‘बंधन’ को ‘मुक्ति’ में बदलें। ऐसा होने के लिए जरूरी है कि आत्म स्मरण या खुद को याद रखें।
अगर हम अपने भीतर के विचारों, निष्कर्ष क्षमता, भावनाओं, पसंद-नापसंद को लगातार बनाए या जगाए रखते हैं तो एक नई तरह का सत्य हमारे सामने खुलता है और हम अपनी ही कैद से मुक्त होते जाते हैं। दुनिया में दो तरह के डर होते हैं। एक सामने उपस्थित डर और एक सोचा हुआ डर। जब एक बाघ हमारे सामने आ जाए तो डर होगा वह वास्तविक डर होगा।
भविष्य को लेकर मन में पैदा होने वाला डर अवास्तविक या सोचा हुआ डर है। लेकिन भविष्य को लेकर जो डर हमारे भीतर होता है वह बहुत रोचक और रोमांचक होता है क्योंकि हम भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं। हम सिर्फ अनुमान लगाते हैं।
Tuesday, 5 January 2016
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सत्संग को अपने आचरण में आत्मसात करें
एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और कहाः "ये मूँग हमारी अमानत हैं। ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे।" - संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये। इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बे को पूजा के स्थान पर रखा और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरे शिष्य ने मूँग के दानों को खेत में बो दिया। इस तरह दो साल में उसके पास बहुत मूँग जमा हो गये।
दो साल बाद संत वापस आये और पहले शिष्य से अमानत वापस माँगी तो वह अपने घर से डिब्बा उठा लाया और संत को थमाते हुए बोलाः "गुरूजी ! आपकी अमानत को मैंने अपने प्राणों की तरह सँभाला है। इसे पालने में झुलाया, आरती उतारी, पूजा-अर्चना की..."
संत बोलेः "अच्छा ! जरा देखूँ त सही कि अन्दर के माल का क्या हाल है ?"
संत ने ढक्कन खोलकर देखा तो मूँग में घुन लगे पड़े थे।
संत ने शिष्य को मूँग दिखाते हुए कहाः "क्यों बेटा ! इन्ही घुनों की पूजा अर्चना करते रहे इतने समय तक !"
शिष्य बेचारा शर्म से सिर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा। इतने में संत ने दूसरे शिष्य को बुलवाकर उससे कहाः "अब तुम भी हमारी अमानत लाओ।"
थोड़ी देर में दूसरा शिष्य मूँग लादकर आया और संत के सामने रखकर हाथ जोड़कर बोलाः "गुरूजी ! यह रही आपकी अमानत।"
संत बहुत प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद देते हुए बोलेः "बेटा ! तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने यह सब किया था। मैं तुम्हें वर्षों से जो सत्संग सुना रहा हूँ, उसको यदि तुम आचरण में नहीं लाओगे, अनुभव में नहीं उतारोगे तो उसका भी हाल इस डिब्बे में पड़े मूँग जैसा हो जायेगा। इस कथा का अभिप्राय यह कि हमें गुरु से प्राप्त ज्ञान का अपने आचरण में आत्मसात कर, उसे अपने दैनिक व्यवहार में अपनाना चाहिए।
Saturday, 2 January 2016
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अपनी वाणी, वर्तन एवं व्यवहार को मधुर रखें
दवे साहेब विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो के बीच बहुत प्रसिद्द थे . उनकी वाणी, वर्तन तथा मधुर व्यवहार से कॉलेज के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियो उन्हें ‘वेदसाहेब’ से संबोधन करते थे. ऐसे भी वे संस्कृत के प्राध्यापक थे, और उनकी बातचीत में संस्कृत श्लोक-सुभाषित बारबार आते थे. उनकी ऐसी बात करने की शैली थी जिससे सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे.एक दिन विज्ञान के विद्यार्थियो की कक्षा में अध्यापक नहीं थे तो वे वहाँ पहुंच गए. सभी विद्यार्थियों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया और अपने स्थान पर बैठ गए। कक्षा प्रतिनिधि ने दवे साहेब से कहा , ” सर , कॉलेज के समारोहों में हमने आपको कई बार सुना है. लेकिन आज आपसे करीब से बातचीत करने का मौका मिला है. कृपया संस्कृत साहित्य में से
कुछ ऐसी बातें बताइये जो हमारे दैनिक जीवन में काम आये .दवे साहेब मुस्कराए और बोले : ” पृथिव्याम त्रिनिरत्नानि जलं, अन्नं, सुभाषितम ||यानि कि अपनी इस धरती पर तीन रत्न हैं – जल,अन्न तथा अच्छी वाणी।बिना जल तथा अन्न हम जी नहीं सकते, लेकिन सुभाषित या अच्छी वाणी एक ऐसा रत्न है जो हमारी बोली को श्रृंगारित करता है. हम अपने विचारों को सरलता से तथा स्पष्टता से सुभाषित द्वारा सबके सम्मुख रख सकते है.दवे साहब अभी बोल ही रहे थे कि किसी विद्यार्थी ने प्रश्न किया , ” हम वाणी का प्रयोग कैसे करें ? तथा हमें किस तरह के लोगों का संग करना चाहिए ?” पुत्र , तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया हैं , इसका उत्तर मैं तीन श्लोकों के माध्यम से देना चाहूंगा :तुम्हारा पहला प्रश्न- वाणी का प्रयोग कैसे करें ?
यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पुर्वमेवाभिभाषते |स्मितपुर्वाभिभाषी च तस्य लोक: प्रसीदति ||देवों के गुरु बृहस्पतिजी हमें इस श्लोक से शिक्षा देते है कि, ‘लोकव्यवहार में वाणी का प्रयोग बहुत ही विचारपूर्वक करना चाहिए. बृहस्पतिजी स्वयं भी अत्यंत मृदुभाषी एवं संयतचित्त है. वे देवराज इन्द्रसे कहते है : ‘राजन ! आप तो तीनों लोकों के राजा हैं, अत: आपको वाणी के विषयमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए. जो व्यक्ति दूसरोँ को देखकर पहले स्वयं बात करना प्रारंभ करता है और मुस्कराकर ही बोलता है, उस पर सभी लोग प्रसन्न हो जाते है.’
यो हि नाभाषते किंचित सर्वदा भृकुटीमुख: |द्वेष्यो भवति भूतानां स सांत्वमिह नाचरन ||
इसके विपरीत जो सदा भौहें टेढ़ी किए रहता है, किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, बोलता भी है तो टेढ़ी या व्यंगात्मक वाणी बोलता है, मीठे वचन न बोलकर कर्कश वचन बोलता है, वह सब लोगों के द्वेष का पात्र बन जाता है.’अब तुम्हारा दूसरा प्रश्न – हमें किसका संग करना चाहिए ?सद्भि: संगं प्रकुर्वीत सिद्धिकाम: सदा नर: |नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम् ||देवों के गुरु बृहस्पतिजी बताते है कि ‘जो मनुष्य चारों पुरुषार्थ [यानि कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष] की सिद्धि हो ऐसी चाहत रखता हो तो उसे सदैव सज्जनों का ही साथ करना चाहिए. दुर्जनों के साथ रहने से इहलोक तथा परलोकमें भी हित नहीं है.’ ”दवेसाहेब तथा विद्यार्थियो का संवाद पूरा हुआ और सभी विद्यार्थियो के मुखमंडल पर आनंद की उर्मी थी, आज सभी विद्यार्थियों को एक अच्छी सीख मिल चुकी थी।
कुछ ऐसी बातें बताइये जो हमारे दैनिक जीवन में काम आये .दवे साहेब मुस्कराए और बोले : ” पृथिव्याम त्रिनिरत्नानि जलं, अन्नं, सुभाषितम ||यानि कि अपनी इस धरती पर तीन रत्न हैं – जल,अन्न तथा अच्छी वाणी।बिना जल तथा अन्न हम जी नहीं सकते, लेकिन सुभाषित या अच्छी वाणी एक ऐसा रत्न है जो हमारी बोली को श्रृंगारित करता है. हम अपने विचारों को सरलता से तथा स्पष्टता से सुभाषित द्वारा सबके सम्मुख रख सकते है.दवे साहब अभी बोल ही रहे थे कि किसी विद्यार्थी ने प्रश्न किया , ” हम वाणी का प्रयोग कैसे करें ? तथा हमें किस तरह के लोगों का संग करना चाहिए ?” पुत्र , तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया हैं , इसका उत्तर मैं तीन श्लोकों के माध्यम से देना चाहूंगा :तुम्हारा पहला प्रश्न- वाणी का प्रयोग कैसे करें ?
यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पुर्वमेवाभिभाषते |स्मितपुर्वाभिभाषी च तस्य लोक: प्रसीदति ||देवों के गुरु बृहस्पतिजी हमें इस श्लोक से शिक्षा देते है कि, ‘लोकव्यवहार में वाणी का प्रयोग बहुत ही विचारपूर्वक करना चाहिए. बृहस्पतिजी स्वयं भी अत्यंत मृदुभाषी एवं संयतचित्त है. वे देवराज इन्द्रसे कहते है : ‘राजन ! आप तो तीनों लोकों के राजा हैं, अत: आपको वाणी के विषयमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए. जो व्यक्ति दूसरोँ को देखकर पहले स्वयं बात करना प्रारंभ करता है और मुस्कराकर ही बोलता है, उस पर सभी लोग प्रसन्न हो जाते है.’
यो हि नाभाषते किंचित सर्वदा भृकुटीमुख: |द्वेष्यो भवति भूतानां स सांत्वमिह नाचरन ||
इसके विपरीत जो सदा भौहें टेढ़ी किए रहता है, किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, बोलता भी है तो टेढ़ी या व्यंगात्मक वाणी बोलता है, मीठे वचन न बोलकर कर्कश वचन बोलता है, वह सब लोगों के द्वेष का पात्र बन जाता है.’अब तुम्हारा दूसरा प्रश्न – हमें किसका संग करना चाहिए ?सद्भि: संगं प्रकुर्वीत सिद्धिकाम: सदा नर: |नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम् ||देवों के गुरु बृहस्पतिजी बताते है कि ‘जो मनुष्य चारों पुरुषार्थ [यानि कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष] की सिद्धि हो ऐसी चाहत रखता हो तो उसे सदैव सज्जनों का ही साथ करना चाहिए. दुर्जनों के साथ रहने से इहलोक तथा परलोकमें भी हित नहीं है.’ ”दवेसाहेब तथा विद्यार्थियो का संवाद पूरा हुआ और सभी विद्यार्थियो के मुखमंडल पर आनंद की उर्मी थी, आज सभी विद्यार्थियों को एक अच्छी सीख मिल चुकी थी।
Friday, 1 January 2016
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Alarming decline in girl child sex ratio
If the latest report on Child sex ratio in the country is anything to go by, the fairer sex in our country continues to get unfair treatment and the society as a whole is responsible for the same, despite government’s initiatives to promote birth of girl child and its `Save Daughter campaign’.
It is indeed shameful to learn that despite daughters/girls making India proud in all spheres of life and knowing the fact that they are no less competent than men, preference for sons and the desire for smaller families has driven down the number of girls - and women - to an all time low in the past several decades. According to report, the child sex ratio for the whole country now stands at 918, dipping further from 927 in 2001, which is lowest since 1961.
As compared to Christians and Muslims, the child sex ratio is more alarming among Hindus where it has declined from 925 in 2001 to 913 in the latest census data. This decline is the biggest among all religious communities.
The steep decline in child sex ratio has once again pointed to the fact that the place of women in our society is far from satisfactory and we all need to be blamed for this reverse trend in child sex ratio.
It is high time we all need to take collective steps to save girl child and encourage their birth for a balanced development of society and nation